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spiritual speaker (health beauty Tips to purify the soul )❤️🙏🦚🙏 राधावल्लभ श्री हरिवंश 🙏 राधावल्लभ लाल की जय ❤️ ❤️ गुरु कृपा केवलं श्री सतगुर देव भगवान की जय ❤️🙏🦚🙏❤️ वृंदावन धाम की जय ❤️
18/04/2026
श्री #राधावल्लभ #लाल जी का #वृंदावन प्राकट्य और आगमन की कथा अत्यंत दिव्य और प्रेममयी है। यह मुख्य रूप से **श्री हित हरिवंश महाप्रभु** से जुड़ी है, जिन्हें राधावल्लभ संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।
यहाँ संक्षेप में उनकी पूरी कथा दी गई है:
# 1. श्री हित हरिवंश महाप्रभु का संकल्प
कहा जाता है कि श्री हित हरिवंश महाप्रभु को स्वयं श्री राधा रानी ने स्वप्न में दर्शन देकर वृंदावन जाने और वहां प्रेम भक्ति का प्रचार करने का आदेश दिया था। जब वे अपने गांव (देवबंद) से वृंदावन की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब रास्ते में **चरथावल** नामक स्थान पर रुके।
2. #ब्राह्मण की पुत्री और विग्रह की प्राप्ति
वहां एक आत्मदेव नाम के ब्राह्मण रहते थे। उन्हें भी स्वप्न में श्री राधा रानी के दर्शन हुए थे। राधा जी ने उन्हें आदेश दिया था कि उनके पास जो **श्री राधावल्लभ लाल** का विग्रह (मूर्ति) है, उसे वे श्री हित हरिवंश महाप्रभु को सौंप दें।
* यह विग्रह अत्यंत प्राचीन था और कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसे अपनी कठोर तपस्या से प्रकट किया था।
* ब्राह्मण ने अपनी दो पुत्रियों का विवाह महाप्रभु के साथ करने का प्रस्ताव रखा और दहेज के रूप में श्री राधावल्लभ लाल जी का विग्रह उन्हें सौंप दिया। #3. #वृंदावन में स्थापना
संवत 1591 (1534 ईस्वी) के आसपास, श्री हित हरिवंश महाप्रभु इस दिव्य विग्रह को लेकर वृंदावन पहुँचे।
* उन्होंने सबसे पहले **मदन टेर** (ऊँची ठौर) नामक स्थान पर, जो यमुना के किनारे था, एक छोटी सी कुटिया में ठाकुर जी को विराजमान किया।
* बाद में, उनके अनन्य प्रेम और सेवा पद्धति से प्रभावित होकर भक्तों ने वहां भव्य मंदिरों का निर्माण कराया।
#राधावल्लभ लाल की विशेषता
श्री राधावल्लभ मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ **ठाकुर जी के साथ राधा जी की कोई अलग मूर्ति नहीं है**।
> **तथ्य:** सिंहासन पर श्री राधावल्लभ जी विराजमान हैं और उनके वाम (बाएं) भाग में एक **स्वर्ण की गद्दी** विराजित है, जिसे 'राधा जी' का स्वरूप माना जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि राधा और कृष्ण दो नहीं, बल्कि एक ही प्राण हैं।
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आज भी राधावल्लभ मंदिर अपनी अनूठी सेवा पद्धति, समाज गायन और 'हित' (प्रेम) की प्रधानता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
07/04/2026
गुरु कृपा केवलं 🙏
❤️
🙏गुरु कृपा केवलं 🙏
02/04/2026
ठाकुर राधा पिय जू महाराज 🙏🦚
गुरु कृपा केवलं 🙏
08/03/2026
🌺 श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार: श्री हित हरिवंश महाप्रभु और श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय का दिव्य इतिहास 🌺
अक्सर हम सोचते हैं कि श्रीकृष्ण को सबसे अधिक प्रिय क्या है? उनकी बाँसुरी (वंशी), जो हमेशा उनके अधरों से लगी रहती है और 'राधा-राधा' पुकारती है। आज हम साक्षात उसी 'वंशी' के अवतार और रसिक-शिरोमणि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के उस अलौकिक जीवन और उनके महान योगदान का दर्शन करेंगे, जिसने ब्रज की भक्ति परम्परा में एक नई क्रांति ला दी।
(यह लेख श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रामाणिक ग्रंथों— 'श्री हित चरित्र', 'रसिक अनन्य माल' और 'निज मत सिद्धांत' के वर्णनों पर आधारित है।)
🌺 प्राकट्य और श्री राधारानी का स्वप्न-आदेश🌺
श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य 1502 ई. (वैशाख शुक्ल एकादशी) को देवबंद (सहारनपुर) में श्री व्यास मिश्र और माता तारावती के घर हुआ था। मान्यता है
हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य 1502 ई. (वैशाख शुक्ल एकादशी) को मथुरा के पास 'बाद' ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री व्यास मिश्र (जो मूल रूप से देवबंद के निवासी थे) राज-काज के सिलसिले में यात्रा कर रहे थे, जब मार्ग में 'बाद' ग्राम के शिविर में इस दिव्य वंशी अवतार का प्राकट्य हुआ। मान्यता है कि बचपन में ही स्वयं श्री राधारानी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर अपना निज मंत्र प्रदान किया था। 32 वर्ष की आयु में राधारानी ने उन्हें पुनः आदेश दिया— "हे हरिवंश! अब तुम मेरे निज धाम 'वृंदावन' जाओ और निकुंज-प्रेम का प्रचार करो।"
🛕 भगवान शिव का हृदय-धन: श्री राधावल्लभ लाल का प्राकट्य
ग्रंथों के अनुसार, देवबंद से वृंदावन आते समय महाप्रभु ने 'चिड़थावल' गाँव में विश्राम किया। वहाँ उनकी भेंट 'आत्मदेव' नामक एक सात्विक ब्राह्मण से हुई।आत्मदेव ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी और वरदान में महादेव से उनके 'हृदय का सबसे प्रिय धन' मांग लिया था। तब शिव जी ने अपने हृदय से 'श्री राधावल्लभ लाल' का वह त्रिभंग ललित विग्रह निकालकर आत्मदेव को दिया था और भविष्यवाणी की थी कि जब वंशी अवतार 'श्री हित हरिवंश' आएँ, तो अपनी कन्याओं का विवाह उनसे कर यह विग्रह उन्हें सौंप देना।
उसी ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार, आत्मदेव ने अपनी दो कन्याओं का विवाह महाप्रभु से किया और महादेव का वह परम गुप्त खजाना उन्हें भेंट स्वरूप सौंप दिया।
🌳 वृंदावन आगमन और खूंखार डाकू नरवाहन का उद्धार🌳
महादेव के उस लावण्यमयी विग्रह को लेकर महाप्रभु वृंदावन पहुँचे और यमुना किनारे 'मदन टेर' (ऊँची ठौर) पर 1534 ई. के आसपास श्री राधावल्लभ लाल की स्थापना की।
उस समय वृंदावन क्षेत्र में 'नरवाहन' नाम के एक अत्यंत क्रूर डाकू और सरदार का खौफ था। अहंकार में चूर होकर जब नरवाहन महाप्रभु की परीक्षा लेने पहुँचा, तो महाप्रभु के मुखमंडल का ओज और उनकी आँखों का राधा-प्रेम देखकर उसके हाथ से हथियार गिर गए। वह रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। महाप्रभु की एक दृष्टि से वह क्रूर डाकू परम 'रसिक भक्त' बन गया और उसने अपना सर्वस्व ठाकुर जी की सेवा में लगा दिया।
🌺 श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय का अद्वितीय दर्शन:🌺
महाप्रभु का सबसे बड़ा योगदान उनकी 'राधा-निष्ठा' है। श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय में श्रीकृष्ण से भी अधिक प्रधानता श्री राधारानी को दी गई है।
महाप्रभु ने यह नियम स्थापित किया कि ठाकुर जी के वाम भाग (बाईं ओर) राधारानी की कोई मूर्ति नहीं होगी, बल्कि उनके निराकार और सर्वोच्च स्वरूप को दर्शाने के लिए एक 'लाल मखमली गद्दी' सजाई जाएगी, जिस पर स्वर्ण मुकुट विराजमान रहता है। यहाँ भगवान से कुछ मांगा नहीं जाता, केवल उन्हें लाड़ लड़ाया जाता है। इस सिद्धांत को 'तत्सुख भाव' (उनके सुख में ही मेरा सुख है) कहा जाता है।
📖 अमर साहित्य और महाप्रभु के मधुर पद
👉हित चौरासी' और 'राधासुधानिधि' की रचना
उन्होंने ब्रजभाषा में 'हित चौरासी' (84 पदों का संग्रह) की रचना की, जिसे ब्रज-रस का सबसे गूढ़ और मीठा ग्रंथ माना जाता है
👉संस्कृत में उन्होंने 'श्री राधासुधानिधि' (270 श्लोकों का संग्रह) रचा, जो राधारानी की महिमा और उनके सौंदर्य का सर्वोच्च ग्रंथ है।
उनके पदों में 'तत्सुख भाव' का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। 'हित चौरासी' का एक सबसे प्रसिद्ध पद इस प्रकार है:
"जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे,
भावै मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे।
मोकों तो प्यारे के नैनन में बास,
प्यारे को बास मेरे नैनन के तारे॥"
(अर्थात: मेरे प्रियतम (कृष्ण) जो कुछ भी करते हैं, मुझे वही अच्छा लगता है; और मुझे जो अच्छा लगता है, मेरे प्रियतम वही करते हैं। मेरा निवास तो मेरे प्रियतम की आँखों में है, और वे मेरी आँखों के तारे बनकर मुझमें बसते हैं।)
🪕 ब्रज की 'रसिक त्रयी' (दिव्य मित्रता)🪕
वृंदावन में श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्वामी हरिदास जी (बांके बिहारी जी वाले) और श्री हरिराम व्यास जी—ये तीनों समकालीन थे। इन तीनों महान संतों की जोड़ी को ब्रज में 'रसिक त्रयी' कहा जाता है। ग्रंथों में वर्णन है कि ये तीनों संत सेवाकुंज और निधिवन की झाड़ियों में एक साथ बैठकर, एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर राधारानी की निकुंज लीलाओं का गायन किया करते थे।
ब्रज की 'रसिक त्रयी' (स्वामी हरिदास, हरिराम व्यास और हित हरिवंश) के प्रमुख स्तंभ, श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने दुनिया को यह सिखाया कि सच्ची भक्ति बाँसुरी की तरह अंदर से 'खोखला' (अहंकार-रहित) हो जाना है, ताकि भगवान स्वयं हमारे भीतर से अपने प्रेम का संगीत बजा सकें।
साक्षात वंशी अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जय!
श्री राधावल्लभ लाल की जय! 🌺
गुरु कृपा केवलं 🙏
श्री सतगुर देव भगवान की जय ❤️
टूटना नहीं 🙏
17/02/2026
मेरो नन्द लाल 🦚❤️🦚
दीक्षा लेने में और पूर्ण शरणागति में क्या अंतर है?
गुर कृपा केवलं 🙏
सतगुरु देव भगवान की जय ❤️
वृंदावन धाम की जय ❤️
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