Ravie
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रामनाथ जी की पुरानी कार बिकाऊ थी। उन्होंने कीमत रखी 200,000 रुपये। कार की हालत अच्छी थी, इसलिए खरीददारों की कमी नहीं थी। OLX पर रोज़ लोग फोन करते—कोई 180k ऑफर देता, कोई 170k—but रामनाथ जी किसी को पसंद नहीं कर पाते।
उनका कहना था,
“कार तो पैसे देकर कोई भी ले जाएगा, लेकिन इसे मैं ऐसे इंसान को दूँगा जो इसे संभालकर रखे। ये मेरे अरमानों और यादों से जुड़ी है।”
इसी बीच एक दिन OLX पर एक आदमी ने कॉल किया—
“सर, मैं कार लेना चाहता हूँ। लेकिन 150k तक ही दे सकता हूँ।”
रामनाथ जी हँस पड़े और थोड़े व्यंग्य से बोले—
“भाई, ये कार खिलौना नहीं है। इतने में तो बाइक भी मुश्किल से मिले। तुम लोग बस bargaining करना जानते हो।”
उन्होंने हँसते हुए फोन काट दिया।
कुछ देर बाद वही खरीदार फिर कॉल करता है। इस बार उसकी आवाज़ भारी और टूटी हुई थी—
“सर, अगर आपको मुझे कार नहीं बेचनी तो मत बेचिए। लेकिन मेरा मज़ाक मत उड़ाइए। मैं गरीब आदमी हूँ… अपनी पत्नी के लिए कार लेना चाहता था। जैसे-तैसे 1,40,000 रुपये जोड़ पाया हूँ। सोचा बाकी 10,000 उधार लेकर पूरी कर लूँगा। लेकिन आपने मेरी मजबूरी का मज़ाक बना दिया। सर, आपको मुझे नहीं बेचनी तो साफ़ कह दीजिए—‘भाई, मेरे बस का नहीं है, कहीं और देख लो।’ मैं कसम खाता हूँ, फिर कभी आपको फोन नहीं करूँगा।”
ये सुनकर रामनाथ जी का दिल अचानक भारी हो गया। उनके सामने अपनी जवानी के संघर्ष तैरने लगे—जब वो भी गिन-गिनकर पैसे जोड़ते थे। लेकिन हकीकत ये थी कि उन्हें पैसों की ज़रूरत थी।
उन्होंने धीरे से जवाब दिया—
“भाई, मैं तेरी मजबूरी समझता हूँ। सच कहूँ तो दिल तो करता है तुझे ही दे दूँ, लेकिन मुझे पैसों की ज़रूरत है। मेरी कार तुझसे ज्यादा कीमत माँगती है। राम जी करें तुझे जल्दी कोई बेहतर कार मिले।”
फोन कट गया… लेकिन उस रात रामनाथ जी देर तक करवटें बदलते रहे। कार भले अगले हफ्ते किसी और को 200k में बिक गई, मगर उस गरीब आदमी की बात उनके दिल में हमेशा के लिए चुभ गई।
कभी-कभी कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होतीं, बस अधूरी रहकर ही दिल में घर कर जाती हैं।
Part 2
सच्ची घटना पर आधारित.....
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