Vaidya Dr. Ajay Gupta
Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.
Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU
किडनी की बीमारी (Chronic Kidney Disease - CKD) वाले मरीजों को अक्सर डॉक्टर Keto Analogues नामक दवाएं या सप्लीमेंट देते हैं। बहुत से मरीज सोचते हैं कि यह कोई "किडनी की दवा" है जो सीधे क्रिएटिनिन कम कर देती है, लेकिन वास्तव में इसका काम थोड़ा अलग और वैज्ञानिक है।
सबसे पहले समझिए: समस्या क्या होती है?
हम जो भोजन खाते हैं, उसमें प्रोटीन होता है। शरीर प्रोटीन को तोड़कर अमीनो एसिड बनाता है, जिनसे मांसपेशियां, हार्मोन और शरीर के अन्य ऊतक बनते हैं।
लेकिन प्रोटीन के उपयोग के बाद शरीर में कुछ अपशिष्ट पदार्थ (waste products) भी बनते हैं, जैसे:
• Urea
• Creatinine
• Nitrogenous wastes
सामान्य व्यक्ति में किडनी इन्हें आसानी से बाहर निकाल देती है।
लेकिन जब किडनी खराब होने लगती है, तब ये अपशिष्ट पदार्थ शरीर में जमा होने लगते हैं और:
• यूरिया बढ़ता है
• क्रिएटिनिन बढ़ता है
• भूख कम होती है
• कमजोरी आती है
• उल्टी या मतली हो सकती है
📣 Keto Analogues क्या हैं?
Keto Analogues वास्तव में कुछ आवश्यक अमीनो एसिड (Essential Amino Acids) के ऐसे रूप हैं जिनमें नाइट्रोजन (Nitrogen) नहीं होता।
सरल भाषा में:
मान लीजिए शरीर को "ईंट" चाहिए घर बनाने के लिए।
सामान्य अमीनो एसिड पूरी ईंट की तरह हैं, लेकिन Keto Analogues आधी बनी हुई ईंट हैं।
जब ये शरीर में पहुंचते हैं तो शरीर अपने अतिरिक्त नाइट्रोजन का उपयोग करके इन्हें पूर्ण अमीनो एसिड में बदल देता है।
इस प्रक्रिया को Transamination कहते हैं।
🎶 Keto Analogues किडनी रोगियों में क्यों दिए जाते हैं?
किडनी के मरीजों में डॉक्टर अक्सर:
Low Protein Diet + Keto Analogues का संयोजन देते हैं।
इससे दो फायदे होते हैं:
1. शरीर को आवश्यक अमीनो एसिड मिल जाते हैं
कम प्रोटीन खाने के बावजूद:
• मांसपेशियां सुरक्षित रहती हैं
• कुपोषण नहीं होता
• शरीर की मरम्मत होती रहती है
2. यूरिया का उत्पादन कम होता है
चूंकि Keto Analogues में नाइट्रोजन नहीं होता, इसलिए:
• कम नाइट्रोजन शरीर में प्रवेश करती है
• कम यूरिया बनता है
• किडनी पर बोझ कम पड़ता है
🤔 क्या Keto Analogues क्रिएटिनिन कम करते हैं?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सीधे तौर पर नहीं।
Keto Analogues कोई ऐसी दवा नहीं हैं जो क्रिएटिनिन को धोकर बाहर निकाल दें।
लेकिन:
• किडनी पर अतिरिक्त बोझ कम होता है
• प्रोटीन से बनने वाले अपशिष्ट कम बनते हैं
• CKD की प्रगति धीमी हो सकती है
परिणामस्वरूप:
• क्रिएटिनिन की बढ़ने की गति धीमी हो सकती है
• कुछ मरीजों में हल्की कमी भी दिख सकती है
लेकिन यह हर मरीज में नहीं होता।
🔥 यूरिया कम करने में कैसे मदद करते हैं?
इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए:
एक CKD मरीज प्रतिदिन 80 ग्राम प्रोटीन खाता है।
तो उसके शरीर में अधिक नाइट्रोजन जाएगी और अधिक यूरिया बनेगा।
अब डॉक्टर:
• प्रोटीन घटाकर 40–50 ग्राम कर देते हैं
• साथ में Keto Analogues दे देते हैं
तो:
✔ शरीर को जरूरी अमीनो एसिड मिल जाते हैं
✔ यूरिया कम बनता है
✔ रक्त में Urea Nitrogen कम हो सकता है
👉 किन मरीजों में सबसे अधिक उपयोगी?
आमतौर पर:
• CKD Stage 3
• CKD Stage 4
• कुछ Stage 5 मरीज (डायलिसिस से पहले)
में इनका उपयोग किया जाता है।
विशेषकर जब:
• क्रिएटिनिन लगातार बढ़ रहा हो
• यूरिया बढ़ा हो
• डॉक्टर Low Protein Diet दे रहे हों
✨ क्या इससे डायलिसिस टल सकती है?
कुछ शोधों में पाया गया है कि:
• Low Protein Diet
• Very Low Protein Diet
• Keto Analogue Supplementation
के संयोजन से कुछ मरीजों में डायलिसिस की आवश्यकता कुछ समय तक टल सकती है।
लेकिन यह सभी मरीजों में संभव नहीं है।
यह रोग की अवस्था, GFR, रक्तचाप नियंत्रण, मधुमेह नियंत्रण और अन्य कारकों पर निर्भर करता है।
☣️ क्या इसके कोई दुष्प्रभाव भी हैं?
अधिकांश मरीजों में यह सुरक्षित मानी जाती है।
फिर भी कुछ लोगों में:
• पेट फूलना
• कब्ज
• मतली
• पेट में असहजता
हो सकती है।
यदि इनमें कैल्शियम भी मौजूद हो तो कुछ मरीजों में:
• रक्त कैल्शियम बढ़ सकता है (Hypercalcemia)
इसलिए नियमित जांच जरूरी होती है।
👉 यदि किसी CKD मरीज का क्रिएटिनिन 3, 4, 5 या उससे अधिक है और डॉक्टर ने Keto Analogues दी हैं, तो यह समझना चाहिए कि यह कोई "जादुई दवा" नहीं है जो तुरंत क्रिएटिनिन या यूरिया घटा दे। इसका मुख्य उद्देश्य किडनी पर बोझ कम करना, शरीर को आवश्यक अमीनो एसिड उपलब्ध कराना, कुपोषण से बचाना और किडनी रोग की प्रगति को धीमा करना है। जब इसे सही Low Protein Diet, रक्तचाप नियंत्रण, मधुमेह नियंत्रण और नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह के साथ लिया जाता है, तब इसका सबसे अधिक लाभ मिलता है।
महत्वपूर्ण: Keto Analogues तभी प्रभावी होती हैं जब मरीज डॉक्टर या डाइटिशियन द्वारा बताई गई Low Protein Diet का भी पालन करे। केवल गोली खाने से अपेक्षित लाभ नहीं मिलता।
Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 02319
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IBS या IBD
ग्रहणी रोग
किडनी फेल्योर और डायलिसिस को समझें
किडनी जब शरीर से पानी, यूरिया और अन्य विषैले पदार्थों को पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकाल पाती, तो इसे Kidney Failure कहा जाता है। ऐसे मामलों में कुछ मरीजों को Dialysis की आवश्यकता पड़ सकती है।
लेकिन याद रखें—डायलिसिस किडनी को ठीक नहीं करता, बल्कि किडनी की कुछ कार्यक्षमताओं को अस्थायी या दीर्घकालिक रूप से सहारा देता है। इसलिए समय पर Creatinine, eGFR, Urine Protein, BP और Diabetes की जाँच एवं उचित चिकित्सा महत्वपूर्ण है।
👉 किडनी की बीमारी में स्वयं दवा बंद या शुरू न करें। विशेषज्ञ की सलाह लें।
आज से कुछ दशक पहले भारत में स्वास्थ्य की चर्चा मुख्यतः संक्रामक रोगों, कुपोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और संक्रमण से होने वाली बीमारियों के आसपास होती थी। लेकिन आज भारत की स्वास्थ्य तस्वीर तेजी से बदल रही है। Diabetes, hypertension, heart disease, obesity, chronic kidney disease, cancer, chronic respiratory diseases और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित कर रही हैं।
Global Burden of Disease (GBD) Study, जिसे Institute for Health Metrics and Evaluation (IHME) के नेतृत्व में किया जाता है, दुनिया के विभिन्न देशों और राज्यों में बीमारी, disability और premature death के burden को मापने का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयास है। GBD में अलग-अलग diseases के साथ उनके risk factors और उनसे होने वाले DALYs यानी disability-adjusted life years का भी अध्ययन किया जाता है।
✨ भारत में बीमारी का बदलता स्वरूप
भारत में स्वास्थ्य का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि अब हमें communicable diseases और non-communicable diseases दोनों का दोहरा burden झेलना पड़ रहा है। एक तरफ संक्रमण, tuberculosis, dengue जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं, वहीं दूसरी तरफ lifestyle और ageing से जुड़ी chronic diseases तेजी से महत्वपूर्ण हो रही हैं।
विशेष रूप से cardiovascular diseases, diabetes, chronic respiratory diseases और cancers जैसे NCDs लंबे समय तक चलते हैं। इनके कारण केवल मृत्यु ही नहीं होती, बल्कि व्यक्ति वर्षों तक बीमारी, disability, दवाओं और healthcare expenditure के साथ जीवन बिताता है।
यही कारण है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी बीमारी से कितने लोगों की मृत्यु हुई। यह देखना भी जरूरी है कि कितने लोग उस बीमारी के साथ वर्षों तक जी रहे हैं।
✨ क्या वास्तव में मरीजों की संख्या बढ़ रही है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी बीमारी के patients की absolute संख्या बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं।
भारत की population बढ़ रही है। साथ ही life expectancy बढ़ने और population ageing के कारण बुजुर्गों की संख्या भी बढ़ रही है। इसके अलावा obesity, physical inactivity, unhealthy diet, to***co, air pollution और metabolic risk factors जैसे कारण chronic diseases के burden को प्रभावित करते हैं।
इसलिए किसी disease की कुल संख्या बढ़ने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि प्रत्येक उम्र के व्यक्ति में उस बीमारी की दर उसी अनुपात में बढ़ गई है। GBD analysis में इसी कारण absolute numbers और age-standardised rates को अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण है।
✨ Diabetes और metabolic diseases की चिंता
भारत में diabetes आज केवल एक individual disease नहीं बल्कि एक बड़ा public-health concern बन चुकी है। GBD 2021 में diabetes को उन causes में शामिल किया गया है जिनका age-adjusted health loss तेजी से बढ़ा है। वैश्विक स्तर पर 2010 के बाद age और population size के प्रभाव को adjust करने के बावजूद diabetes का burden तेजी से बढ़ा।
भारत में इसके साथ obesity, abdominal obesity, dyslipidaemia, hypertension और physical inactivity जैसी metabolic समस्याएं भी महत्वपूर्ण हो रही हैं।
यही कारण है कि आज 30–40 वर्ष की उम्र में भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनमें diabetes, high BP, fatty liver या abnormal lipid profile जैसी समस्याएं एक साथ दिखाई देती हैं।
✨ Heart disease का बढ़ता महत्व
भारत में cardiovascular diseases भी disease burden का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। High blood pressure, diabetes, high LDL cholesterol, smoking, obesity, physical inactivity और unhealthy dietary patterns cardiovascular risk को प्रभावित करते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण संदेश है—Heart disease केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है। कम उम्र में risk factors की मौजूदगी भविष्य में cardiovascular events का risk बढ़ा सकती है।
इसलिए केवल बीमारी होने के बाद treatment करना पर्याप्त नहीं है। Risk factors की early identification और prevention equally important हैं।
✨ Kidney और liver diseases भी पीछे नहीं
Diabetes और hypertension जैसी chronic conditions लंबे समय में kidney को प्रभावित कर सकती हैं। इसी तरह obesity, diabetes और metabolic syndrome के बढ़ते burden के साथ metabolic dysfunction-associated steatotic liver disease यानी MASLD जैसी स्थितियां भी clinical practice में अधिक दिखाई दे रही हैं।
इन diseases की विशेष चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में मरीज को अक्सर कोई स्पष्ट symptom नहीं होता। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन laboratory investigations या imaging में disease सामने आ सकती है।
✨ Air pollution: भारत की एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती
भारत में disease burden केवल lifestyle से निर्धारित नहीं होता। Environmental factors भी महत्वपूर्ण हैं।
GBD-based analysis के अनुसार 2017 में भारत में लगभग 12.4 लाख deaths air pollution से attributable estimated की गई थीं, जो उस वर्ष भारत की कुल deaths का लगभग 12.5% थीं। Air pollution से जुड़ा burden विशेष रूप से उत्तर भारत के कई राज्यों में अधिक था।
इसका प्रभाव respiratory diseases के अलावा cardiovascular और अन्य health outcomes पर भी पड़ सकता है।
✨ असली चुनौती केवल "बीमारों की संख्या" नहीं है
भारत के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि कितने लोग बीमार हैं। बड़ी चुनौती यह है कि कितने लोग लंबे समय तक chronic disease के साथ जीवन जी रहे हैं।
एक व्यक्ति को diabetes है, दूसरे को hypertension, तीसरे को fatty liver और चौथे को chronic kidney disease। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों में ये conditions एक-दूसरे से जुड़ी हुई मिलती हैं।
एक ही व्यक्ति में obesity → insulin resistance → diabetes → hypertension → dyslipidaemia → cardiovascular disease और kidney disease जैसी interconnected chain विकसित हो सकती है।
इसलिए आने वाले समय में healthcare system को केवल disease-specific treatment से आगे बढ़कर risk-factor based prevention, early diagnosis और integrated chronic disease management पर अधिक ध्यान देना होगा।
✨ आयुर्वेद और prevention की भूमिका
भारत जैसे देश में lifestyle modification और preventive healthcare का महत्व बहुत अधिक है। संतुलित आहार, नियमित physical activity, पर्याप्त नींद, stress management, to***co से दूरी और नियमित health screening जैसे उपाय chronic diseases के prevention में महत्वपूर्ण हैं।
आयुर्वेद में भी आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया है। आधुनिक preventive medicine और evidence-based Ayurveda के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र यही हो सकता है—बीमारी आने के बाद treatment के साथ-साथ बीमारी आने से पहले risk को पहचानना और कम करना।
भारत में बीमारी की तस्वीर बदल रही है। हम केवल infections से लड़ने वाले देश नहीं रहे; अब हमें chronic diseases और उनके risk factors के बढ़ते burden का भी सामना करना पड़ रहा है।
GBD जैसे studies हमें यह समझने में मदद करते हैं कि कौन-सी बीमारियां और risk factors population health को सबसे अधिक प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन आंकड़ों का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि समय रहते prevention और बेहतर healthcare planning की दिशा दिखाना है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बीमारी का इंतजार करने के बजाय risk factors की पहचान करें। क्योंकि आने वाले भारत में सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती केवल लोगों को लंबा जीवन देना नहीं, बल्कि उन्हें स्वस्थ और disability-free जीवन के अधिक वर्ष देना होगी।
✨ क्या दवाइयाँ भी बढ़ा रही हैं बीमारियों का बोझ?
आज भारत में Diabetes, Hypertension, Heart Disease, Chronic Kidney Disease, Fatty Liver, Obesity और कई अन्य chronic diseases के मरीज लगातार दिखाई दे रहे हैं। Global Burden of Disease जैसे बड़े epidemiological studies भी दुनिया और भारत में non-communicable diseases के बढ़ते burden की ओर संकेत करते हैं।
ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक है—क्या केवल बदलती lifestyle और उम्र बढ़ने को ही इसके लिए जिम्मेदार माना जाए, या लंबे समय तक चलने वाली दवाइयों और आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था की भी इसमें कोई भूमिका है?
इस प्रश्न का उत्तर न तो पूरी तरह “हाँ” है और न पूरी तरह “नहीं”।
✨ दवाइयाँ जीवन बचाती हैं, लेकिन हर दवा risk-free नहीं होती
आधुनिक चिकित्सा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में antibiotics, antihypertensives, antidiabetic drugs, statins, anticoagulants, steroids, chemotherapy और अनेक life-saving medicines शामिल हैं। इन दवाओं ने लाखों-करोड़ों लोगों की जान बचाई है और अनेक रोगों में survival बढ़ाया है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
हर pharmacological intervention के साथ कुछ संभावित adverse effects होते हैं। यदि दवा गलत indication में दी जाए, जरूरत से अधिक dose में दी जाए, लंबे समय तक बिना monitoring के चलती रहे, दूसरी दवाओं के साथ interaction करे या patient स्वयं दवा लेता रहे, तो medication-related harm हो सकता है।
WHO के अनुसार medicines और therapeutic options से संबंधित harm, healthcare में होने वाले preventable harm का लगभग आधा हिस्सा हो सकता है।
✨ क्या लंबे समय तक दवा लेने से नई बीमारी हो सकती है?
कुछ परिस्थितियों में बिल्कुल हो सकती है।
उदाहरण के लिए लंबे समय तक systemic corticosteroids लेने पर hyperglycaemia, diabetes, hypertension, osteoporosis, weight gain और infection का risk बढ़ सकता है।
इसी प्रकार NSAIDs का लंबे समय तक या अनुचित उपयोग gastrointestinal bleeding, renal injury और blood pressure worsening जैसी समस्याओं से जुड़ सकता है।
कुछ medicines liver injury, electrolyte abnormalities, sedation या metabolic disturbances पैदा कर सकती हैं।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि “दवा केवल लाभ देती है और कोई नुकसान नहीं करती।”
✨ बीमारी दवा से हुई या बीमारी के कारण दवा चल रही थी?
मान लीजिए किसी व्यक्ति को 15 वर्षों से hypertension है और वह antihypertensive medicine ले रहा है। बाद में उसे chronic kidney disease हो जाती है।
क्या हम केवल यह देखकर कह सकते हैं कि CKD दवा के कारण हुई?
नहीं।
उस व्यक्ति में लंबे समय से uncontrolled hypertension, diabetes, obesity, vascular disease, ageing या अन्य कारण भी kidney disease के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
इसी प्रकार diabetes वाले व्यक्ति में statin लेने के बाद भी diabetes बनी रहती है। इसका अर्थ यह नहीं कि statin ने उसका diabetes पैदा किया।
Temporal association और causation एक ही चीज नहीं हैं।
किसी drug को किसी disease का कारण कहने के लिए pharmacological mechanism, epidemiological evidence, dose-response relationship, alternative causes और dechallenge/rechallenge जैसे वैज्ञानिक evidence को देखना पड़ता है।
✨ Polypharmacy—एक बढ़ती हुई चुनौती
आज विशेष रूप से elderly patients में एक साथ कई chronic diseases मौजूद रहती हैं।
एक मरीज को diabetes है, hypertension है, cholesterol बढ़ा हुआ है, joint pain है, acidity है और sleep problem है।
परिणाम?
एक साथ कई दवाइयाँ।
इसे polypharmacy कहा जाता है।
जितनी अधिक medicines, उतनी अधिक संभावना drug–drug interaction, duplication, inappropriate prescribing और medication error की हो सकती है।
WHO ने polypharmacy को medication safety के प्रमुख high-risk areas में शामिल किया है।
✨ क्या medication errors भी मरीजों की संख्या बढ़ा रहे हैं?
यह एक वास्तविक समस्या है।
दवा का गलत selection, गलत dose, गलत समय, गलत route, drug interaction, prescribing error या monitoring की कमी से मरीज को नुकसान हो सकता है।
WHO के Global Patient Safety Report 2024 के अनुसार preventable medication-related harm लगभग 1 in 20 patients को प्रभावित कर सकता है और इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा severe या life-threatening हो सकता है। Low- and middle-income countries में reported burden भी महत्वपूर्ण है।
भारत जैसे देश में यह विषय और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि self-medication, over-the-counter drug use, polypharmacy और adverse drug reaction reporting जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं।
भारत में pharmacovigilance पर प्रकाशित literature भी ADR reporting के under-reporting को एक महत्वपूर्ण समस्या बताता है।
✨ लेकिन क्या modern medicine ही बढ़ते chronic diseases की मुख्य वजह है?
भारत में Diabetes, cardiovascular disease, obesity, CKD और अन्य NCDs के बढ़ते burden को केवल medicines से समझाना उचित नहीं होगा।
इसके पीछे कई interconnected factors हैं—
**Population ageing
• population growth
• sedentary lifestyle
• unhealthy diet
• obesity
• to***co
• air pollution
• metabolic risk factors
• genetic susceptibility
• improved diagnosis
• improved survival**
इन सभी की भूमिका disease के अनुसार अलग-अलग होती है।
फिर दवाइयों की भूमिका कहाँ है?
दवाइयों की भूमिका को तीन स्तरों पर देखना चाहिए।
पहला—दवा सही indication, सही dose और सही monitoring के साथ दी गई और benefit मिला।
दूसरा—दवा आवश्यक थी लेकिन adverse effect हुआ, जिसे पहचानकर dose बदलनी या medicine बदलनी पड़ी।
तीसरा—दवा की आवश्यकता नहीं थी, गलत तरीके से दी गई या लंबे समय तक बिना review के चलती रही, जिससे preventable harm हुआ।
तीसरी स्थिति healthcare system के लिए विशेष चिंता का विषय है।
यही कारण है कि आज दुनिया में Rational Drug Use, Deprescribing, Medication Review और Pharmacovigilance जैसे concepts तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।
✨ समाधान क्या है?
समाधान “सारी दवाइयाँ बंद कर देना” नहीं है।
समाधान है—
सही मरीज + सही diagnosis + सही medicine + सही dose + सही duration + regular monitoring
और जहां आवश्यक हो, वहां समय-समय पर यह समीक्षा करना कि क्या दवा अभी भी जरूरी है।
Lifestyle modification, nutrition, exercise, weight management, sleep, stress management और preventive screening को भी chronic disease management का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।
भारत में preventive healthcare की चर्चा करते समय Ayurveda के आहार, विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और स्वास्थ्य संरक्षण के सिद्धांतों को आधुनिक evidence-based preventive medicine के साथ वैज्ञानिक रूप से explore किया जा सकता है।
हर चिकित्सा पद्धति में benefit के साथ safety, quality control, appropriate indication और pharmacovigilance महत्वपूर्ण हैं।
आज भारत में chronic diseases का burden बढ़ रहा है। इसके पीछे केवल एक कारण नहीं है। Lifestyle, ageing, environmental exposure, metabolic risk factors, genetics, बेहतर diagnosis और increased survival—सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।
साथ ही यह भी सच है कि medication-related harm एक वास्तविक और वैज्ञानिक रूप से documented समस्या है। WHO स्वयं इसे global patient-safety priority मानता है।
Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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Cholesterol और Triglycerides दिल को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं?
“डॉक्टर साहब, मेरी रिपोर्ट में Cholesterol और Triglycerides दोनों बढ़े हुए हैं। क्या इससे सचमुच Heart Attack हो सकता है?”
यह सवाल आजकल बहुत आम है। कई लोग Lipid Profile की रिपोर्ट देखते हैं, लेकिन Total Cholesterol, LDL, HDL और Triglycerides का वास्तविक महत्व नहीं समझते।
सच्चाई यह है कि खून में कुछ प्रकार के cholesterol और अन्य lipids का लंबे समय तक असामान्य स्तर Atherosclerosis यानी धमनियों में plaque बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर Coronary Artery Disease, Heart Attack और Stroke के जोखिम को बढ़ा सकती है।
Cholesterol आखिर है क्या?
Cholesterol शरीर के लिए आवश्यक lipid है। इसका उपयोग cell membranes, hormones और अन्य महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में होता है।
समस्या cholesterol के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके असंतुलित स्तर और lipoprotein particles के लंबे समय तक बढ़े रहने में है।
LDL—जिसे अक्सर “Bad Cholesterol” कहा जाता है
LDL cholesterol को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक cholesterol पहुंचाने में भूमिका निभाता है। जब LDL लंबे समय तक अधिक रहता है, तो arterial wall में cholesterol deposition और atherosclerotic plaque formation का जोखिम बढ़ता है।
इसलिए केवल Total Cholesterol देखकर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के overall cardiovascular risk के अनुसार LDL का लक्ष्य अलग हो सकता है।
HDL—“Good Cholesterol” की कहानी
HDL को आम भाषा में “Good Cholesterol” कहा जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि HDL जितना अधिक हो, हृदय उतना ही सुरक्षित रहेगा।
आज cardiovascular risk assessment में केवल HDL को बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय पूरे lipid profile और व्यक्ति के अन्य risk factors को देखा जाता है।
Triglycerides क्यों बढ़ते हैं?
Triglycerides शरीर में energy storage का एक प्रमुख रूप हैं। लेकिन इनके बढ़े हुए स्तर अक्सर obesity, insulin resistance, diabetes, excessive calorie intake, alcohol, sedentary lifestyle और कुछ metabolic conditions के साथ दिखाई देते हैं।
विशेष रूप से बहुत अधिक triglycerides होने पर pancreatitis का जोखिम भी बढ़ सकता है।
Lipid Profile क्यों बिगड़ता है?
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—
• अत्यधिक calorie-rich और processed food
• अधिक saturated fat और कुछ परिस्थितियों में trans fat
• मोटापा और abdominal obesity
• physical inactivity
• diabetes/insulin resistance
• excessive alcohol intake
• hypothyroidism
• कुछ kidney या liver disorders
• genetic/familial lipid disorders
• कुछ medications
• अनियमित lifestyle
इसलिए केवल “तेल खाने” को cholesterol बढ़ने का एकमात्र कारण मानना सही नहीं है।
आयुर्वेद इसे कैसे देखता है?
आयुर्वेद में मेद, अग्नि, आहार और विहार को metabolic health के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है। अत्यधिक गुरु, स्निग्ध और calorie-dense आहार, दिन में अधिक सोना, physical inactivity तथा अग्निमांद्य जैसी स्थितियों को metabolic imbalance से जोड़ा जा सकता है।
आधुनिक भाषा में देखें तो obesity, insulin resistance, dyslipidemia और metabolic syndrome के साथ इनमें कुछ समान clinical themes दिखाई देते हैं।
लेकिन किसी आधुनिक lipid disorder को सीधे किसी एक आयुर्वेदिक रोग का पर्याय मानना उचित नहीं होगा। दोनों प्रणालियों की terminology और disease classification अलग हैं।
क्या केवल दवा से cholesterol नियंत्रित होगा?
कई लोगों में lifestyle modification पर्याप्त हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में medication की आवश्यकता होती है।
विशेषकर जिन लोगों को पहले से heart attack, coronary artery disease, stroke या अन्य atherosclerotic cardiovascular disease हो चुकी है, उनमें lipid-lowering treatment अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऐसे मरीजों को अपनी prescribed medicine केवल इसलिए बंद नहीं करनी चाहिए कि cholesterol की रिपोर्ट कुछ समय के लिए normal आ गई है।
दिल को बचाने के लिए क्या करें?
1. वजन नियंत्रित रखें।
विशेषकर abdominal obesity को नजरअंदाज न करें।
2. नियमित physical activity करें।
Walking, brisk walking, yoga या अन्य suitable exercise को दैनिक routine का हिस्सा बनाएं।
3. भोजन की गुणवत्ता सुधारें।
सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, nuts/seeds और उपयुक्त protein sources को प्राथमिकता दें तथा अत्यधिक processed और calorie-dense foods को सीमित करें।
4. Diabetes और Blood Pressure नियंत्रित रखें।
5. Smoking से पूरी तरह दूरी रखें।
6. पर्याप्त नींद और stress management पर ध्यान दें।
7. Lipid Profile को केवल एक isolated report की तरह न देखें।
LDL, HDL, triglycerides, non-HDL cholesterol तथा व्यक्ति के overall cardiovascular risk को साथ में देखना अधिक महत्वपूर्ण है।
💐 आयुर्वेदिक दवाये कौन सी है?
आयुर्वेद में Guggulu (गुग्गुलु) का प्रयोग मेदवृद्धि और lipid metabolism से संबंधित स्थितियों में लंबे समय से किया जाता रहा है। बहुत से clinical studies में Guggulu preparations से Total Cholesterol, LDL और Triglycerides में कमी देखी गई है।
इसी प्रकार Triphala, जिसमें Haritaki, Bibhitaki और Amalaki शामिल हैं, तथा Amalaki का प्रयोग metabolic health के लिए किया जाता है। अध्ययनों में इनके lipid profile पर संभावित लाभ पाए गए हैं।
Lasuna (लहसुन), Methi (मेथी) और Kalonji/Nigella sativa पर भी cholesterol और triglycerides के संदर्भ में clinical studies उपलब्ध हैं और इनमें modest lipid-lowering effect की संभावना दिखाई देती है।
हर बढ़ा हुआ cholesterol तुरंत Heart Attack नहीं करता और हर व्यक्ति का treatment एक जैसा नहीं होता। Risk जितना अधिक होगा, lipid management उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।
Dr Ajay Gupta
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#आयुर्वेद #कोलेस्ट्रॉल #ट्राइग्लिसराइड #लिपिडप्रोफाइल #हृदयस्वास्थ्य #मेदोरोग #स्वास्थ्यजागरूकता
फैटी लिवर को हल्के में न लें!
पेट की चर्बी, बढ़ता वजन, Diabetes, ज्यादा मीठा-तला भोजन, शराब और शारीरिक निष्क्रियता—ये सभी लिवर में अतिरिक्त फैट जमा होने का कारण बन सकते हैं।
शुरुआत में फैटी लिवर के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन लंबे समय तक रहने पर लिवर में सूजन, Fibrosis और Cirrhosis का जोखिम बढ़ सकता है।
✅ वजन नियंत्रित रखें
✅ रोज़ नियमित शारीरिक गतिविधि करें
✅ चीनी और अत्यधिक तला-भुना भोजन कम करें
✅ Diabetes और cholesterol को नियंत्रित रखें
✅ जरूरत पड़ने पर LFT और Ultrasound/FibroScan जैसी जांच कराएं
फैटी लिवर का इलाज केवल दवा नहीं—सही आहार, व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
#फैटीलिवर #आयुर्वेद #स्वास्थ्यजागरूकता
विश्व हृदय दिवस: दिल को बचाना है तो केवल दवा नहीं, जीवनशैली भी बदलनी होगी
हर साल 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस (World Heart Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल हृदय रोग के बारे में जानकारी देना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना भी है कि हृदय की सेहत हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली से गहराई से जुड़ी हुई है।
आज हृदय रोग केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है। कम उम्र में बढ़ता Blood Pressure, Diabetes, Obesity, High Cholesterol, Smoking, Physical Inactivity और लगातार Stress हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा रहे हैं।
💐 आयुर्वेद में हृदय को क्यों महत्वपूर्ण माना गया?
आयुर्वेद में हृदय को शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना गया है। चरक संहिता में हृदय को ओज का स्थान बताया गया है और इसे चेतना, मन तथा जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं से जोड़ा गया है।
आयुर्वेद का दृष्टिकोण केवल किसी एक अंग के उपचार तक सीमित नहीं है। इसमें आहार, विहार, निद्रा, मानसिक संतुलन, पाचन और दिनचर्या को स्वास्थ्य का आधार माना गया है।
आज आधुनिक चिकित्सा भी यह स्वीकार करती है कि हृदय रोग की रोकथाम में lifestyle modification की महत्वपूर्ण भूमिका है।
🤔 दिल की सबसे बड़ी दुश्मन हमारी जीवनशैली-
दिनभर बैठे रहना, बाहर का अत्यधिक तला-भुना भोजन, ज्यादा नमक और चीनी, मोटापा, धूम्रपान, शराब, कम नींद और लगातार तनाव—ये सभी हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
आयुर्वेद में हितकर आहार और उचित विहार पर विशेष जोर दिया गया है। इसका आधुनिक अर्थ यह है कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर की आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए।
थाली में अधिक सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें और उचित मात्रा में प्रोटीन शामिल करना और अत्यधिक processed तथा calorie-dense foods को कम करना हृदय के लिए उपयोगी है।
👉 रोज थोड़ा चलना भी बड़ी शुरुआत है
हृदय एक muscle है और शरीर को नियमित physical activity की आवश्यकता होती है।
यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से inactive है तो अचानक बहुत अधिक exercise करने के बजाय धीरे-धीरे शुरुआत करनी चाहिए। नियमित brisk walking, योग, प्राणायाम तथा व्यक्ति की क्षमता के अनुसार अन्य physical activities उपयोगी हो सकती हैं।
लेकिन यदि किसी व्यक्ति को सीने में दर्द, सांस फूलना, चक्कर या exercise के दौरान असामान्य थकान होती है, तो exercise शुरू करने से पहले चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।
आधुनिक जीवन में chronic stress एक बड़ी समस्या है। लगातार तनाव नींद, भोजन, physical activity और blood pressure जैसे कई cardiovascular risk factors को प्रभावित कर सकता है।
आयुर्वेद में सद्वृत्त, मानसिक संतुलन, उचित निद्रा और नियमित दिनचर्या को स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
ध्यान, योग, प्राणायाम, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ स्वस्थ सामाजिक संबंध तनाव प्रबंधन में मदद कर सकते हैं।
दिल की सेहत के लिए किसी चमत्कारी दवा की तलाश करने से पहले अपनी रोजमर्रा की आदतों को देखिए।
कम नमक, संतुलित भोजन, नियमित physical activity, पर्याप्त नींद, तनाव पर नियंत्रण, धूम्रपान से दूरी और नियमित health check-up—यही हृदय की वास्तविक सुरक्षा की नींव है।
आयुर्वेद हमें हजारों वर्षों से एक महत्वपूर्ण संदेश देता आया है—स्वास्थ्य की रक्षा केवल बीमारी होने के बाद नहीं, बल्कि बीमारी होने से पहले करनी चाहिए।
इस विश्व हृदय दिवस पर अपने दिल को केवल प्यार ही नहीं, समय भी दीजिए।
स्वस्थ हृदय, स्वस्थ जीवन।
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"डॉक्टर साहब, मेरी कमर का दर्द कोई साधारण दर्द नहीं है..."
मरीज अक्सर अपनी परेशानी कुछ इस तरह बताता है—
"डॉक्टर साहब, मेरी कमर के निचले हिस्से में कई महीनों से दर्द रहता है। सुबह जब बिस्तर से उठता हूँ तो कमर और पीठ इतनी अकड़ी रहती है कि सीधा खड़ा होने में भी समय लगता है। आधा घंटा या उससे ज़्यादा चलने-फिरने के बाद थोड़ी राहत मिलती है।"
"अगर मैं ज़्यादा देर बैठा रहूँ या आराम करूँ तो दर्द और बढ़ जाता है, लेकिन जैसे ही टहलता हूँ या थोड़ा व्यायाम करता हूँ तो आराम महसूस होता है। रात में भी दर्द के कारण नींद खुल जाती है, खासकर सुबह के समय।"
"धीरे-धीरे दर्द कमर से कूल्हों, नितंबों और पीठ के ऊपरी हिस्से तक पहुँचने लगा है। कभी-कभी गर्दन भी अकड़ जाती है। पहले जितना झुक पाता था, अब उतना नहीं झुक पाता। सीना भी पहले जैसा नहीं फैलता, गहरी सांस लेने पर खिंचाव और दर्द महसूस होता है।"
"कभी-कभी एड़ी में भी बहुत दर्द होता है, जैसे कोई कील चुभ रही हो। कई बार आंख लाल हो जाती है, दर्द होता है और रोशनी चुभती है।"
"दर्द की वजह से काम करने में परेशानी होती है। लंबे समय तक बाइक चलाना, कुर्सी पर बैठना या यात्रा करना मुश्किल हो जाता है।"
✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस क्या है?✨
यह एक दीर्घकालिक (Chronic) सूजन संबंधी ऑटोइम्यून रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) गलती से रीढ़ की हड्डी (Spine) और सैक्रोइलियक (Sacroiliac) जोड़ में सूजन पैदा कर देती है।
यदि समय पर उपचार न मिले, तो रीढ़ की हड्डियाँ आपस में जुड़ (Fusion) सकती हैं, जिससे पीठ और गर्दन की लचक कम हो जाती है और शरीर झुक सकता है।
👉 मुख्य लक्षण
• कमर के निचले हिस्से में 3 महीने से अधिक समय तक दर्द
• सुबह कमर और पीठ में अकड़न (30 मिनट या उससे अधिक)
• आराम करने से दर्द बढ़ना
• चलने-फिरने या व्यायाम से आराम मिलना
• रात के दूसरे हिस्से में दर्द बढ़ना
• नितंबों में एक तरफ या दोनों तरफ दर्द
• गर्दन और पीठ में अकड़न
• झुकने और मुड़ने में कठिनाई
• गहरी सांस लेने पर सीने में दर्द या जकड़न
• एड़ी में दर्द
• आंख लाल होना, दर्द और धुंधला दिखना
• थकान और कमजोरी
👉 किसे अधिक होता है?
• प्रायः 15–40 वर्ष की आयु में शुरुआत
• पुरुषों में अपेक्षाकृत अधिक
• परिवार में किसी को यह रोग होने पर जोखिम बढ़ जाता है
• HLA-B27 जीन वाले लोगों में संभावना अधिक होती है, हालांकि यह सभी में नहीं पाया जाता।
😫 कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
यदि कमर का दर्द 3 महीने से अधिक समय से हो, सुबह अकड़न रहती हो, आराम करने से दर्द बढ़ता हो और चलने से आराम मिलता हो, तो इसे सामान्य कमर दर्द समझकर नज़रअंदाज़ न करें। समय पर जांच और उपचार से रोग की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस में कौन-कौन सी जांच करानी चाहिए और कब करानी चाहिए? ✨
एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) का निदान केवल एक जांच से नहीं होता। मरीज के लक्षण, शारीरिक परीक्षण और विभिन्न जांचों को मिलाकर रोग की पुष्टि की जाती है।
1. शुरुआती जांच (जब पहली बार रोग का संदेह हो)
यदि कमर में 3 महीने से अधिक समय से दर्द हो, सुबह अकड़न रहती हो और चलने से आराम मिलता हो, तो ये जांच करानी चाहिए—
• ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) – शरीर में सूजन का स्तर जानने के लिए।
• CRP (C-Reactive Protein) – सक्रिय सूजन का अधिक संवेदनशील संकेत।
• CBC (Complete Blood Count) – एनीमिया या संक्रमण का आकलन।
• Liver Function Test (LFT) – दवाएं शुरू करने से पहले।
• Kidney Function Test (KFT) – दवाओं के सुरक्षित उपयोग के लिए।
• Vitamin D और Vitamin B12 – यदि हड्डियों या मांसपेशियों की कमजोरी का संदेह हो।
• HLA-B27 – निदान में सहायक, लेकिन केवल इसी के आधार पर रोग की पुष्टि नहीं होती।
2. इमेजिंग (X-ray और MRI)
X-ray Sacroiliac Joint
• सबसे पहले यही जांच कराई जाती है।
• यदि रोग पुराना है, तो इसमें जोड़ में परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
MRI Sacroiliac Joint
• यदि X-ray सामान्य हो लेकिन लक्षण स्पष्ट हों।
• शुरुआती अवस्था में सूजन पकड़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जांच।
X-ray Spine
• जब गर्दन या पूरी रीढ़ में दर्द, अकड़न या झुकाव बढ़ रहा हो।
3. उपचार शुरू होने के बाद फॉलो-अप
यदि केवल दर्द की दवा (NSAIDs) चल रही हो—
• ESR, CRP: हर 3–6 महीने में (या आवश्यकता अनुसार)।
यदि Sulfasalazine जैसी DMARD दवा चल रही हो—
• CBC, LFT: पहले 3 महीने तक हर महीने, फिर हर 3 महीने।
• KFT: हर 3–6 महीने।
यदि Methotrexate दिया जा रहा हो (विशेष परिस्थितियों में)—
• CBC, LFT, KFT: पहले 1–3 महीने तक हर 2–4 सप्ताह, फिर हर 8–12 सप्ताह।
यदि Biological Therapy (जैसे TNF inhibitors या IL-17 inhibitors) चल रही हो— उपचार शुरू करने से पहले—
• CBC
• LFT
• KFT
• HBsAg, Anti-HCV
• HIV
• TB Screening (Mantoux/IGRA एवं Chest X-ray)
उपचार के दौरान—
• CBC, LFT, KFT: हर 3–6 महीने
• ESR, CRP: रोग की सक्रियता के अनुसार।
4. अन्य जांच
• DEXA Scan (Bone Mineral Density): यदि लंबे समय से रोग हो, बार-बार स्टेरॉयड लिया हो या ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम हो।
• Vitamin D: आवश्यकता अनुसार दोबारा।
• Eye Examination: यदि आंख लाल हो, दर्द हो या धुंधला दिखाई दे।
• ECG / Echocardiography: यदि हृदय संबंधी लक्षण हों।
• Pulmonary Function Test (PFT): यदि सांस लेने में तकलीफ हो या सीने का फैलाव कम हो।
✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) में एलोपैथी की दवाएं – कब और किस स्थिति में दी जाती हैं? ✨
एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस एक दीर्घकालिक सूजन (Chronic Inflammatory Disease) है। आधुनिक चिकित्सा में उपलब्ध दवाओं का मुख्य उद्देश्य दर्द और सूजन कम करना, रीढ़ की कार्यक्षमता बनाए रखना तथा रोग की प्रगति को धीमा करना है। वर्तमान में कोई दवा इस रोग का स्थायी इलाज (Cure) सिद्ध नहीं हुई है।
1. NSAIDs (दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं)
कब दी जाती हैं?
• रोग की शुरुआत में।
• हल्के से मध्यम दर्द और अकड़न होने पर।
• अधिकांश मरीजों में यही प्रथम (First-line) उपचार होता है।
उदाहरण
• Naproxen
• Indomethacin
• Diclofenac
• Etoricoxib
• Celecoxib
सावधानी
• गैस्ट्रिक अल्सर, किडनी रोग, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप या हृदय रोग में सावधानी।
• लंबे समय तक उपयोग में किडनी, पेट और हृदय संबंधी दुष्प्रभावों का जोखिम बढ़ सकता है।
2. Proton Pump Inhibitors (PPI)
कब दी जाती हैं?
• यदि NSAIDs लंबे समय तक चलानी हों।
• पेट में अल्सर या एसिडिटी का जोखिम हो।
उदाहरण
• Pantoprazole
• Rabeprazole
• Esomeprazole
3. DMARDs (Disease Modifying Anti-Rheumatic Drugs)
Sulfasalazine
कब दी जाती है?
• जब हाथ-पैर के जोड़ों (Peripheral Arthritis) में सूजन हो।
• केवल रीढ़ की बीमारी (Axial Disease) में इसका लाभ सीमित माना जाता है।
Methotrexate
• केवल विशेष परिस्थितियों में, विशेषकर यदि अन्य जोड़ों की सूजन हो।
• केवल रीढ़ के रोग में सामान्यतः प्रभावी नहीं माना जाता।
4. Corticosteroids (स्टेरॉयड)
कब दिए जाते हैं?
• किसी विशेष जोड़ में अत्यधिक सूजन होने पर स्थानीय इंजेक्शन के रूप में।
• आंख की सूजन (Uveitis) जैसी जटिलताओं में विशेषज्ञ की सलाह से।
• लंबे समय तक नियमित रूप से मुंह से स्टेरॉयड देना एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस के नियमित उपचार का हिस्सा नहीं माना जाता।
उदाहरण
• Prednisolone
• Methylprednisolone
• Triamcinolone (Joint Injection)
5. Biologic DMARDs (जैविक दवाएं)
कब दी जाती हैं?
• जब NSAIDs से पर्याप्त लाभ न मिले।
• MRI या अन्य जांचों में सक्रिय सूजन हो।
• रोग बहुत सक्रिय हो और दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा हो।
TNF-alpha Inhibitors
• Adalimumab
• Infliximab
• Etanercept
IL-17 Inhibitors
• Secukinumab
• Ixekizumab
उपचार शुरू करने से पहले
• TB की जांच
• Hepatitis B, Hepatitis C
• HIV
• CBC, LFT, KFT
6. JAK Inhibitors
कब दिए जाते हैं?
• यदि Biologics प्रभावी न हों या उपयुक्त न हों।
• कुछ मरीजों में विशेषज्ञ द्वारा चयनित स्थिति में।
उदाहरण
• Upadacitinib
7. दर्द नियंत्रित करने की सहायक दवाएं
यदि मांसपेशियों में ऐंठन या अतिरिक्त दर्द हो तो चिकित्सक आवश्यकता अनुसार अल्प अवधि के लिए मांसपेशी शिथिलक (Muscle Relaxants) या साधारण दर्द निवारक दवाएं दे सकते हैं।
👉 महत्वपूर्ण बातें
• नियमित व्यायाम और फिजियोथेरेपी उपचार का अनिवार्य हिस्सा हैं।
• धूम्रपान रोग की प्रगति को तेज कर सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।
• किसी भी दवा को बिना चिकित्सकीय सलाह के शुरू या बंद नहीं करना चाहिए।
• Biologic और JAK inhibitors प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकते हैं, इसलिए उपचार के दौरान नियमित फॉलो-अप और जांच आवश्यक होती है।
✨ एंकिलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस में आयुर्वेदिक उपचार ✨
आयुर्वेद में यह रोग मुख्यतः आमवात, वातव्याधि, कटिग्रह एवं त्रिकग्रह के अंतर्गत समझा जाता है। रोग की अवस्था के अनुसार दवाओं का चयन किया जाता है। यहाँ बताई गई किसी भी दवा का प्रयोग बिना चिकित्सक की सलाह लिये नही करना है, क्योंकि मात्रा और कैसे लेनी है इसके लिए परामर्श जरूरी है
1. आम अवस्था (दर्द, सूजन, सुबह अधिक अकड़न)
• सिंहनाद गुग्गुलु
• आमवातारि रस
• रास्ना सप्तक क्वाथ
• दशमूल क्वाथ
• एरण्डमूल क्वाथ
2. निराम अवस्था (सूजन कम होने के बाद)
• महायोगराज गुग्गुलु
• योगराज गुग्गुलु
• अश्वगंधा
• गुडूची
• दशमूलारिष्ट / अश्वगंधारिष्ट (आवश्यकतानुसार)
3. जीवनशैली
• नियमित व्यायाम एवं योग
• गर्म पानी
• हल्का एवं सुपाच्य भोजन
• ठंडे, तले-भुने और बासी भोजन से परहेज
ध्यान दें: दवाओं का चयन रोग की अवस्था, प्रकृति और अन्य रोगों को देखकर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए।
Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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