Riya Pandit
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14/06/2026
आज का आधुनिक समाज धीरे धीरे नंगा होता जा रहा है..???
बिकनी और पैंटी मे फंसी भारतीय युवाओं की प्रतिदिन की 2 GB डाटा ना तो बेरोजगारी का अहसास होने दे रही है और ना उनको शिक्षा की कमी महसूस हो रही ना उनको राष्ट्र की बर्बादी को देखने दे रही है...???
सामाजिक न्याय समानता और अधिकार तो धीरे धीरे कोसों दूर होते जा रहे है एक तरफ धर्म का अंधा माहौल जहां पुरूष बाबा बनकर नंगे घूमे रहे जिनका आध्यात्मिक ज्ञान सामाजिक उदारता से कोई मतलब नही है बस अधंविश्वास और पाखण्ड चर्म पर चढ़ रहा है तो दूसरी और फेमश होने की लगी औरतों की लत जो साडी़,घाघरा,और घूघंट की ओढ़नी को छौड़कर बिकनी और कच्छे तक पहूंच गयी है..???
नंगेपन का यह दौर जहां धर्म वालों को लगता है की नागा बाबाओं की वजह से हमारा धर्म मजबूत होगा और औरतों को लगता है की नंगापन हमारी काबिलियत है और हम मजबूत हो रही है...???
आज हर तीसरे घर की औरत का बायोडाटा सोशल मिडिया पर मौजूद है
वह कहां जाती है ..???
कब सब्जी लेती है ..???
किस दूकान से ली कौन सी दूकान से कपडे़ खरीदे..???
कब ससुराल गयी ...???
कब पीहर से आई..???
कब किस रिस्तेदार की शादी मे गयी ...???
क्या खाया क्या बनाया...???
उनका पति क्या काम करता है..???
कब उनका पति घर से बाहर जाता है ...???
कहां जाता है क्या काम करता है ...???
उनके घर का माहौल कैसा है ..???
परिवार मे कितनी बोलचाल है ...???
और यही वजह है की सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्राईवेट जानकारी के तहत आज अधिकतर अफराध सामान्य बन चुके है और बहुत ही आसान तरीके से अपराध को अन्जाम दिया जाता है..??
यदि यह युग ऐसे ही चलता रहा तो रेप,बलात्कार,किडनैप भारत के अदंर तेजी से बढे़गा और आपराधिक दुनिया मे भारत की छवी वैसे भी धुंधली है और आगे अधिक होगी..???
इसलिए सोशल मिडिया पर स्वंय की जानकारी तभी अफलोड करो जब आप वहां जाकर आ चुके हो ..???
या उस काम को आपने कर दिया हो..???
क्योंकि आज के समय में दुश्मन वह नही है जिनकी दुश्मनी समाज या परिवार से है बल्कि वह है जो आपकी काबिलियत और आपकी पर्सनल्टी है और ऐसे ही कहीं अफराध और घटना होती आई है जिनके पीछे आपका खुद का बायोडाटा मौजूद रहता है...???
घर की औरतों को सोशल मिडिया की फेमशता से दूर रखे जो सामाजिक और नैतिकता की क्रियाशैली से दूर है...???
जो औरतें सभ्य और नैतिक सामाजिक विचारधारा को बढ़ावा दे रही हैं न्याय नैतिकता समानता का उचारण कर आगे बढ़ रही है केवल उन्हीं औरतों को सोशल मीडिया पर Support करें हमारे आस पास बहुत सी महिलाएं है जो किसी न किसी मिशन से जुड़ी हूई है उन महिलाओं का आगे बढ़ाया जाये...
आपकी क्या प्रतिक्रिया है..???
अपने अनमोल विचार कमेंट्स में जरूर दीजियेगा।
पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर जरूर कीजिएगा।🙏
#मोटिवेशनल
14/06/2026
टेंशन में रहने वाले हर शादीशुदा आदमी ने यह पोस्ट ज़रूर पढ़ना चाहिए।
1️⃣ अगर आप आज सुबह उठे हैं, तो अपनी पत्नी के पास जाएँ, उसका हाथ पकड़कर 5 मिनट बैठें।
इससे दिनभर की टेंशन कम हो जाती है।
2️⃣ घर की लक्ष्मी पत्नी ही होती है।
उसे जितना प्यार देंगे, घर में उतनी ही शांति रहेगी।
3️⃣ पत्नी को समय दें या उस पर पूरा भरोसा रखें।
फिर घर युद्ध का मैदान नहीं बनता।
4️⃣ जो अपनी पत्नी का प्रेमी नहीं बन सकता,
वह अधूरा आदमी है।
5️⃣ दिन में एक बार “I love you” या “मैं तुम्हें प्यार करता हूँ” बोल दें।
इससे उसकी सारी थकान और दुख हल्का हो जाता है।
6️⃣ मन साफ़ रखने के लिए अपना फेसबुक पासवर्ड, मोबाइल लॉक—सब पत्नी को दें।
7️⃣ औरतों के दिल में प्यार भी होता है और थोड़ा घमंड भी।
इसलिए पत्नी के घमंड को प्यार से ही मिटाएँ।
8️⃣ माँ बच्चे को जन्म देने की जो पीड़ा सहती है,
बाप सारी ज़िंदगी प्यार करके भी उसका बदला नहीं चुका सकता।
इसलिए किसी पति को अपनी बच्चों की माँ — यानी अपनी पत्नी — को कभी दुख नहीं देना चाहिए।
🌸 जब आदमी में ताकत और जेब में पैसे होते हैं, वह पत्नी की अहमियत नहीं समझता।
लेकिन जब उम्र 65 पार होती है, तब इन बातों का असली मतलब समझ आता है।
13/06/2026
"अगर आज के बाद इस घर में कदम रखा, तो मेरी लाश देखोगे!"
पूरे मोहल्ले ने यह चीख सुनी थी।
दरवाज़े पर खड़ी थी 65 साल की शांति देवी...
और सामने खड़ा था उनका इकलौता बेटा अर्जुन।
अर्जुन की आँखों में आँसू थे।
लेकिन शांति देवी के चेहरे पर गुस्सा था।
उन्होंने बेटे का हाथ झटक दिया और दरवाज़ा बंद कर लिया।
मोहल्ले वाले हैरान थे।
क्योंकि अर्जुन वही बेटा था जिसे शांति देवी अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती थीं।
फिर ऐसा क्या हुआ कि एक माँ ने अपने बेटे को घर से निकाल दिया?
असल कहानी 25 साल पहले शुरू हुई थी...
अर्जुन जब दस साल का था, तभी उसके पिता की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
घर में खाने तक के पैसे नहीं थे।
शांति देवी ने लोगों के घरों में बर्तन मांजे, कपड़े धोए, झाड़ू-पोंछा किया।
कई रातें ऐसी गुजरीं जब उन्होंने खुद खाना नहीं खाया लेकिन बेटे को भूखा नहीं सोने दिया।
एक दिन अर्जुन ने पूछा था,
"माँ, तुम खाना क्यों नहीं खाती?"
शांति देवी मुस्कुराई थीं।
"मुझे भूख नहीं है बेटा।"
लेकिन उस रात अर्जुन ने अपनी माँ को रोते हुए देखा था।
उसे समझ आ गया था कि घर में सिर्फ एक रोटी बची थी।
और वह रोटी माँ ने उसे खिला दी थी।
उसी दिन अर्जुन ने कसम खाई—
"एक दिन मैं बड़ा आदमी बनूँगा और माँ को दुनिया की सारी खुशियाँ दूँगा।"
साल बीत गए।
अर्जुन पढ़ाई में बहुत तेज निकला।
इंजीनियर बना।
अच्छी नौकरी मिली।
फिर उसकी शादी निशा से हो गई।
शुरुआत में सब ठीक था।
लेकिन धीरे-धीरे निशा को सास की हर बात खटकने लगी।
"हर बात में दखल देती हैं।"
"हर समय टोकती रहती हैं।"
"अब हमें अपनी जिंदगी जीने दो।"
अर्जुन समझाने की कोशिश करता।
लेकिन घर का माहौल बिगड़ता गया।
एक दिन निशा रोते हुए बोली,
"या तो मैं रहूँगी या तुम्हारी माँ।"
अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उधर माँ...
इधर पत्नी...
वह टूट गया।
कुछ दिनों बाद शांति देवी ने खुद ही फैसला कर लिया।
उन्होंने अपना छोटा सा बैग उठाया और बोलीं,
"बेटा, मैं वृद्धाश्रम चली जाती हूँ।"
अर्जुन रो पड़ा।
"नहीं माँ, ऐसा मत कहो।"
शांति देवी मुस्कुरा दीं।
"कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए दूर जाना पड़ता है।"
और वह चली गईं।
तीन साल गुजर गए।
अर्जुन हर महीने पैसे भेजता।
लेकिन माँ कभी घर नहीं आईं।
वह सिर्फ एक बात कहतीं—
"खुश रहो बेटा।"
फिर एक दिन अर्जुन के जीवन में तूफान आ गया।
उसकी कंपनी बंद हो गई।
नौकरी चली गई।
बैंक का लोन सिर पर था।
दोस्त गायब हो गए।
रिश्तेदार फोन उठाना बंद कर चुके थे।
उधर निशा भी बदलने लगी।
रोज झगड़े होने लगे।
एक दिन वह बच्चों को लेकर मायके चली गई।
अर्जुन अकेला रह गया।
पूरी तरह अकेला।
एक रात उसने सोचा—
"अब जीकर क्या करूँ?"
वह रेलवे ट्रैक की तरफ चल पड़ा।
आँखों से आँसू बह रहे थे।
तभी पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई—
"अर्जुन!"
वह पलटा।
और देखकर दंग रह गया।
सामने उसकी माँ खड़ी थी।
शांति देवी।
"माँ... आप यहाँ?"
शांति देवी रो रही थीं।
"तू मरने जा रहा था ना?"
अर्जुन काँप गया।
"आपको कैसे पता?"
शांति देवी बोलीं,
"माँ को सब पता चल जाता है।"
फिर उन्होंने अपने पल्लू से एक कागज निकाला।
वह बैंक की रसीद थी।
अर्जुन ने देखा...
उसके पूरे लोन की रकम जमा हो चुकी थी।
"ये किसने भरा?"
अर्जुन हैरान था।
शांति देवी मुस्कुराईं।
"मैंने।"
"लेकिन आपके पास इतने पैसे कहाँ से आए?"
अगला सच सुनकर अर्जुन की दुनिया हिल गई।
शांति देवी बोलीं,
"तेरे पापा की आखिरी निशानी... गाँव की जमीन..."
"मैंने बेच दी।"
अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।
"माँ... वो जमीन तो आपकी जिंदगी थी।"
शांति देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"मेरी जिंदगी जमीन नहीं थी बेटा..."
"मेरी जिंदगी तू है।"
उस रात अर्जुन अपनी माँ के पैरों में सिर रखकर रोता रहा।
सुबह उसने माँ को घर ले जाने का फैसला किया।
लेकिन...
जब वह वृद्धाश्रम पहुँचा...
तो डॉक्टर ने उसे रोका।
"आप देर कर चुके हैं।"
अर्जुन का दिल धड़कना बंद सा हो गया।
"क्या मतलब?"
डॉक्टर की आँखें नम थीं।
"आपकी माँ को कैंसर था।"
"आखिरी स्टेज।"
अर्जुन के हाथ से बैग गिर गया।
"नहीं..."
डॉक्टर ने बताया—
"उन्होंने इलाज नहीं करवाया।"
"कहती थीं, पैसे बेटे के काम आएँगे।"
अर्जुन दौड़कर कमरे में पहुँचा।
माँ बिस्तर पर थीं।
बहुत कमजोर।
लेकिन चेहरे पर वही मुस्कान।
उन्होंने धीरे से कहा,
"आ गया बेटा?"
अर्जुन उनके सीने से लगकर रो पड़ा।
"माँ... मुझे माफ़ कर दो।"
शांति देवी ने काँपते हाथों से उसका चेहरा छुआ।
और बोलीं—
"माँ अपने बच्चों को माफ़ नहीं करती बेटा..."
"क्योंकि माँ कभी नाराज़ ही नहीं होती।"
कुछ मिनट बाद...
उनका हाथ धीरे-धीरे नीचे गिर गया।
और हमेशा के लिए शांत हो गया।
पूरा कमरा रो रहा था।
लेकिन सबसे ज़्यादा अर्जुन रो रहा था।
क्योंकि जिस माँ ने उसके लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी...
वह उसे छोड़कर जा चुकी थी।
एक साल बाद...
अर्जुन ने उसी वृद्धाश्रम के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगवाया।
जिस पर लिखा था—
"यह आश्रम मेरी माँ शांति देवी की याद में बनाया गया है।"
"क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वह नहीं जिसके पास पैसा है... बल्कि वह है जिसके पास माँ है।"
और बोर्ड के नीचे एक लाइन और थी—
"माँ के रहते हुए उनकी कदर कर लो... क्योंकि उनके जाने के बाद सिर्फ तस्वीरें बोलती हैं, माँ नहीं।" ❤️
संदेश:
कई बार कहानी का सबसे बड़ा खलनायक कोई इंसान नहीं होता, बल्कि वह समय होता है जो हमें अपनों की कीमत बहुत देर से समझाता है। 🙏🏻💔
Vandna Tripathi ✍️
13/06/2026
भारत जैसे देशों में आने वाले समय में बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करेगी।
यहां की शादी व्यवस्था वो नरक है जिसमें पढ़ा लिखा कर अपनी जवान बेटी दूसरों के घर दो और बहुत सारा पैसा भी दो..!
लड़की कमाती है तो भी, नहीं कमाती है तो भी...! कितना बकवास सिस्टम है ये...
बेटियों को जिस दिन पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ मिलने लग जायेगा ( धरातल पर, सिर्फ कानून में नहीं) उस दिन ऐसे लड़कियों का मरना बंद हो जाएगा।
अपने बाप के घर वापिस जाने पर उसे ये नहीं लगेगा कि भाई भाभी या समाज क्या कहेगा..!
उसे पता होगा अपने हिस्से के गरजा रही हूं वापिस..!
उस दिन वो अपने पेरेंट्स का वेट भी नहीं करेगी कि वो लेने आए ससुराल से तब ही जाऊंगी...!
नहीं रखा ससुराल या पति ने ढंग से तो खुद ही चली जाएगी..!
ये हत्या/ आत्महत्याएं इसलिए हो रही है कि लड़कियों के पास लौटकर जाने को घर नहीं है।
पति चाहेगा तो ही ससुराल रह सकती है, उधर पिता माता चाहेंगे तो ही मायके रह सकती है। खुद का चाहना कुछ है ही नहीं।
लड़की का घर होना सबसे ज्यादा जरूरी है। अभी hm यहीं तक पहुंच पाए है कि लड़कियों को पढ़ा दे, नौकरी करने दे। अभी बहुत जरूरी जो है वो ये कि उनका घर भी हो। पिता से मिला घर (घर में हिस्सा)। जैसे लड़कों को मिलता है।
लड़कों को कभी इस समस्या से नहीं गुजरना पड़ता कि किसी और के घर जाना है, अपने फ्रेंड्स, कंफर्ट जॉन, पेरेंट्स , सिबलिंग्स......सब छोड़कर।
इसमें लड़कों का दोष नहीं, व्यवस्था का है।
इस व्यवस्था में वही लड़कियां कामयाब हो रही जिनको रणनीति आती हैं, इस सिस्टम में एडजस्ट होने की, या लाभ लेने की। जिनकी संख्या बहुत कम हैं।
साधारण लड़कियों को वर्षों लग जाते नए घर, लोगों के बीच एडजस्ट होने में।
(( पहले परिवार छोड़ना पड़ेगा, फिर फ्रेंड्स फिर करियर कॉम्प्रोमाइज और फिर मदरहुड... इतने चैलेंज के बाद कोई इंसान, कितना ही ओरिजिनल पर्सनेलिटी में जी पाएगा.. ये सब समझ पाने के लिए ही Feminism की जरूरत है ))
12/06/2026
1 🔖 पानी में गुड़ डालिए,बीत जाए जब रात।
सुबह छानकर पीजिए,अच्छे हों हालात।।
2🔖 धनिया की पत्ती मसल,बूंद नैन में डार।
दुखती अंखियां ठीक हों,पल लागे दो-चार।।
3🔖 ऊर्जा मिलती है बहुत,पिएं गुनगुना नीर।
कब्ज खतम हो पेट की,मिट जाए हर पीर।।
4🔖 प्रातः काल पानी पिएं,घूंट-घूंट कर आप।
बस दो-तीन गिलास है,हर औषधि का बाप।।
5🔖 ठंडा पानी पियो मत,करता क्रूर प्रहार।
करे हाजमे का सदा,ये तो बंटाढार।।
6🔖 भोजन करें धरती पर,अल्थी-पल्थी मार।
चबा-चबा कर खाइए,वैद्य न झांकें द्वार।।
7🔖 प्रातः काल फल रस लो,दुपहर लस्सी-छांस।
सदा रात में दूध पी,सभी रोग का नाश।
8🔖 प्रात-दोपहर लीजिए,जब नियमित आहार।
तीस मिनट की नींद लो,रोग न आवें द्वार।।
9🔖 भोजन करके रात में,घूमें कदम हजार।
डाक्टर,ओझा,वैद्य का,लुट जाए व्यापार।।
10🔖 घूंट-घूंट पानी पियो,रह तनाव से दूर।
एसिडिटी या मोटापा,होवें चकनाचूर।।
11🔖 अर्थराइज या हार्निया,अपेंडिक्स का त्रास।
पानी पीजै बैठकर,कभी न आवें पास।।
12🔖 रक्तचाप बढ़ने लगे,तब मत सोचो भाय।
सौगंध राम की खाइ के,तुरत छोड़ दो चाय।।
13🔖 सुबह खाइए कुवंर-सा,दुपहर यथा नरेश।
भोजन लीजै रात में,जैसे रंक सुरेश।।
14🔖 देर रात तक जागना,रोगों का जंजाल।
अपच, आंख के रोग संग,तन भी रहे निढाल।।
15🔖 दर्द, घाव, फोड़ा,चुभन,सूजन,चोट पिराइ।
बीस मिनट चुंबक धरौ,पिरवा जाइ हेराइ।।
16🔖 सत्तर रोगों को करे,चूना हमसे दूर।
दूर करे ये बांझपन,सुस्ती अपच हुजूर।।
17🔖 भोजन करके जोहिए,केवल घंटा डेढ़।
पानी इसके बाद पी,ये औषधि का पेड़।।
18🔖 अलसी, तिल, नारियल,घी,सरसों का तेल।
यही खाइए नहीं तो,हार्ट समझिए फेल।।
19🔖 पहला स्थान सेंधा नमक,पहाड़ी नमक सु जान।
श्वेत नमक है सागरी,ये है जहर समान।।
20🔖 एल्यूमिन के पात्र का,करता है जो उपयोग।
आमंत्रित करता सदा,वह अड़तालीस रोग।।
21🔖 फल या मीठा खाइके,तुरत न पीजै नीर।
ये सब छोटी आंत में,बनते विषधर तीर।।
22🔖 चोकर खाने से सदा,बढ़ती तन की शक्ति।
गेहूं मोटा पीसिए,दिल में बढ़े विरक्ति।।
23🔖 रोज मुलहठी चूसिए,कफ बाहर आ जाए।
बने सुरीला कंठ भी,सबको लगत सुहाए।।
24🔖 भोजन करके खाइए,सौंफ,गुड़,अजवान।
पत्थर भी पच जाएगा,जानै सकल जहान।।
25🔖 लौकी का रस पीजिए,चोकर युक्त पिसान। तुलसी, गुड़, सेंधा नमक,हृदय रोग निदान।।
26🔖 चैत्र माह में नीम की,पत्ती हर दिन खावे।
ज्वर, डेंगू या मलेरिया,बारह मील भगावे।।
27🔖 सौ वर्षों तक वह जिए,लेते नाक से सांस।
अल्पकाल जीवें,करें मुंह से श्वासोच्छ्वास।।
28🔖 सितम गर्म जल से कभी,करिए मत स्नान।
घट जाता है आत्मबल,नैनन को नुकसान।।
29🔖 हृदय रोग से आपको,बचना है श्रीमान।
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक,का मत करिए पान।।
30🔖 अगर नहावें गरम जल,तन-मन हो कमजोर।
नयन ज्योति कमजोर हो,शक्ति घटे चहुंओर।।
31 तुलसी का पत्ता करें,यदि हरदम उपयोग।
मिट जाते हर उम्र में,तन में सारे रोग।।
🌼 रचना_पारम्परिक 🌼
परंपरा का पालन करें,immunity अपने
आप बढ़ेगी,रोग निरोधक क्षमता में वृद्धि
होगी किन्तु अखाद्य का परहेज करना
अत्यंत आवश्यक है।
🙏 सदा सर्वदासुमंगल💐
🙏 जयश्रीराम💐
11/06/2026
हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।
अप्सराओं का मुख्य कार्य इंद्र एवं अन्य देवताओं को प्रसन्न रखना था। विशेषकर गंधर्वों और अप्सराओं का सहचर्य बहुत घनिष्ठ माना गया है। गंधर्वों का संगीत और अप्सराओं का नृत्य स्वर्ग की शान मानी जाती है। अप्सराएँ पवित्र और अत्यंत सम्माननीय मानी जाती है। अप्सराओं को देवराज इंद्र यदा-कड़ा महान तपस्वियों की तपस्या भंग करने को भेजते रहते थे। पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जब किसी तपस्वी की तपस्या से घबराकर, कि कहीं वो त्रिदेवों से स्वर्गलोक ही ना मांग लें, देवराज इंद्र ने कई अप्सराओं को पृथ्वी पर उनकी तपस्या भंग करने को भेजा।
अप्सराओं का सौंदर्य ऐसा था कि वे सामान्य तपस्वियों की तपस्या को तो खेल-खेल में भंग कर देती थी। हालाँकि ऐसे भी महान ऋषि हुए हैं जिनकी तपस्या को अप्सरा भंग ना कर पायी और उन्हें उनके श्राप का भाजन करना पड़ा। महान ऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को रम्भा भंग ना कर पायी और उसे महर्षि के श्राप को झेलना पड़ा किन्तु बाद में वही विश्वामित्र मेनका के सौंदर्य के आगे हार गए। उर्वशी ने भी कई महान ऋषियों की तपस्या भंग की किन्तु मार्कण्डेय ऋषि के समक्ष पराजित हुई।
अप्सराओं को उपदेवियों की श्रेणी का माना जाता है। वे मनचाहा रूप बदल सकती हैं और वरदान एवं श्राप देने में भी सक्षम मानी जाती है। कई अप्सराओं ने अनेक असुरों और दैत्यों के नाश में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसमें से तिलोत्तमा का नाम उल्लेखनीय है जो सुन्द-उपसुन्द की मृत्यु का कारण बनी। रम्भा को कुबेर के पुत्र नलकुबेर के पास जाने से जब रावण रोकता है और उसके साथ दुर्व्यहवार करता है तब वो रावण को श्राप देती है कि यदि वो किसी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसी श्राप के कारण रावण देवी सीता को उनकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श ना कर सका। उर्वशी ने अर्जुन को १ वर्ष तक नपुंसक रहने का श्राप दिया था।
पुराणों में कुल १००८ अप्सराओं का वर्णन है जिनमे से १०८ प्रमुख अप्सराओं की उत्पत्ति देवराज इंद्र ने की थी। उन १०८ अप्सराओं में भी ११ अप्सराओं को प्रमुख माना जाता है। उन ११ अप्सराओं में भी ४ अप्सराओं का सौंदर्य अद्वितीय माना गया है। ये हैं - रम्भा, उर्वशी, मेनका और तिलोत्तमा। रम्भा सभी अप्सराओं की प्रधान और रानी है। कई अप्सराएं ऐसी भी हैं जिन्हे पृथ्वीलोक पर रहने का श्राप मिला था जैसे बालि की पत्नी तारा, दैत्यराज शम्बर की पत्नी माया और हनुमान की माता अंजना।
अप्सराएँ दो प्रकार की मानी गयी हैं:
दैविक: ऐसी अप्सराएँ जो स्वर्ग में निवास करती हैं। रम्भा सहित मुख्य ११ अप्सराओं को दैविक अप्सरा कहा जाता है।
लौकिक: ऐसी अप्सराएँ जो पृथ्वी पर निवास करती हैं। जैसे तारा, माया, अंजना इत्यादि। इनकी कुल संख्या ३४ बताई गयी है।
अप्सराओँ को सौभाग्य का प्रतीक भी माना गया है। कहते हैं अप्सराओं का कौमार्य कभी भंग नहीं होता और वो सदैव कुमारी ही बनी रहती है। समागम के बाद अप्सराओं को उनका कौमार्य वापस प्राप्त हो जाता है। उनका सौंदर्य कभी क्षीण नहीं होता और ना ही वे कभी बूढी होती हैं। उनकी आयु भी बहुत अधिक होती है। मार्कण्डेय ऋषि के साथ वार्तालाप करते हुए उर्वशी कहती है - हे महर्षि! मेरे सामने कितने इंद्र आये और कितने इंद्र गए किन्तु मैं वही की वही हूँ। जब तक १४ इंद्र मेरे समक्ष इन्द्रपद को नहीं भोग लेते मेरी मृत्यु नहीं होगी।
ये भी जानने योग्य है कि भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रतापी पुरुवंश स्वयं अप्सरा उर्वशी की देन है। उनके पूर्वज पुरुरवा ने उर्वशी से विवाह किया जिससे आगे पुरुवंश चला जिसमे ययाति, पुरु, यदु, दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, शांतनु, भीष्म और श्रीकृष्ण पांडव जैसे महान राजाओं और योद्धाओं ने जन्म लिया। उन्ही के दूसरे वंशबेल में इक्षवाकु कुल में भगवान श्रीराम ने जन्म लिया। अन्य संस्कृतियों में जैसे ग्रीक धर्म में भी अप्सराओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त कई देशों जिनमे से इंडोनेशिया, कम्बोडिया, चीन और जावा में अप्सराओं का बहुत प्रभाव है।
आइये मुख्य अप्सराओं और उनके मन्त्रों के विषय में जानते हैं:
प्रधान अप्सरा - रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
मेनका
तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा
७ प्रमुख अप्सराएँ:
कृतस्थली
पुंजिकस्थला
प्रम्लोचा
अनुम्लोचा
घृताची
वर्चा
पूर्वचित्ति
अन्य प्रमुख अप्सराएँ:
अम्बिका
अलम्वुषा
अनावद्या
अनुचना
अरुणा
असिता
बुदबुदा
चन्द्रज्योत्सना
देवी
गुनमुख्या
गुनुवरा
हर्षा
इन्द्रलक्ष्मी
काम्या
कांचन माला: ॐ श्री कांचन माले आगच्छागच्छ स्वाहा
कर्णिका
केशिनी
कुण्डला हारिणि: ॐ श्री ह्रीं कुण्डला हारिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
क्षेमा
लता
लक्ष्मना
मनोरमा
मारिची
मिश्रास्थला
मृगाक्षी
नाभिदर्शना
पूर्वचिट्टी
पुष्पदेहा
भूषिणि: ॐ वाः श्री वाः श्री भूषिणि आगच्छागच्छ स्वाहा
रक्षिता
रत्नमाला: ॐ श्री ह्रीं रत्नमाले आगच्छागच्छ स्वाहा
ऋतुशला
साहजन्या
समीची
सौरभेदी
शारद्वती
शुचिका
सोमी
सुवाहु
सुगंधा
सुप्रिया
सुरजा
सुरसा
सुराता
शशि: ॐ श्री शशि देव्या मा आगच्छागच्छ स्वाहा
उमलोचा
07/06/2026
एक खूबसूरत महिला अपने तीन साल के बच्चे को चिड़ियाघर घुमा रही थी। वहीं पांच-सात कॉलेज के लड़के उसे बार-बार देखते हुए आपस में कुछ बातें कर रहे थे। वो उस खूबसूरत, अकेली देहाती युवती के पीछे हो लिए। युवती अपने बच्चे को कभी गोद में तो कभी उंगली पकड़े उसे बारी-बारी से जानवरों को दिखा रही थी। पीछे लगे आवारा लड़कों से बिल्कुल बेखबर...
"चलती है क्या नौ से बारह" फिल्मी गाने गाते वो उसे कट मारकर अट्टहास करते आगे निकल गए। युवती ने उनपर ध्यान नहीं दिया। वो हिरन के बाड़े के पास अपने बच्चे को उन्हें दिखा रही थी। बच्चा चहकता हुआ उन्हें देख रहा था। आवारा लड़के उस युवती को घूर रहे थे। वो लड़के बगल में ही शेर के बाड़े के पास जोर से उसे देख फब्तियां कस रहे थे।
उनमें से एक लड़का पूरे जोश में था। बाड़े के ऊपर लगे ग्रिल पर बैठ भद्दे गाने गा रहा था। युवती बच्चे को लिए शेर को दिखाने बढ़ चली थी। युवती को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसे उन लड़कों से तनिक भी भय नहीं या वो उन्हें अनदेखा अनसुना कर रही है, युवक अतिउत्साहित हो उठा। सभी ठहाके लगा रहे थे। युवती बाड़े के पास पहुंच चुकी थी। तभी बाड़े के ऊपर चढ़ा लड़का,लड़खड़ाते हुए, बाड़े के अंदर गिर पड़ा। लोगों के होश फाख्ता हो गए।
बाड़े से दूर बैठा शेर उठ चुका था। उसने गुर्राते हुए कदम धीरे-धीरे लड़के की तरफ बढ़ा दिया। उसके दोस्त असहाय होकर खड़े थे और सिर्फ चिल्ला रहे थे। भागता हुआ एक गार्ड आकर शेर को आवाज देकर जाने को कह रहा था। एक मिनट के भीतर अफरा-तफरी मच चुकी थी। शेर को आता देख गिरा हुआ लड़का डर से कांप रहा था। उसके जोश के साथ शायद होश भी ठंढे पड़ चुके थे।
बचाओ..बचाओ" की आवाज लगातार तेज हो रही थी और शेर की चाल भी।
तभी उस देहाती युवती ने, अपने बदन से साढ़े पांच मीटर लंबी साड़ी उतार बाड़े में लटका दिया। बाड़े में गिरे लड़के ने तुरंत उस साड़ी का सिरा मजबूती से पकड़ लिया फिर लोगों की मदद से उसे निकाल लिया गया। गार्ड युवक को संभालता हुआ बोल पड़ा..."पहले तुम्हारी माँ ने जन्म दिया था, आज इस युवती ने तुम्हें दुबारा जन्म दिया है"
सिर्फ ब्लाउज और पेटिकोट में खड़ी वो अर्धन/ग्न युवती अब उन लड़कों को उनकी माँ नज़र आ रही थी... अतः हो सके तो किसी को बेवजह सताओ नहीं, पता नहीं वह कब तुम्हारे लिए देवदूत बनकर खड़ा हो जाए…! 🔥♥️💯⚡👍
06/06/2026
24 मार्च 2020 को रात 8 बजे लॉकडाउन की घोषणा हुई। सिर्फ 4 घंटे बाद पूरा देश बंद हो गया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार अप्रैल 2020 में लगभग 12.2 करोड़ लोगों की नौकरियां चली गईं।
बेरोजगारी दर 23.5 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे खराब स्तरों में से एक थी।
दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, अहमदाबाद और बेंगलुरु से लाखों प्रवासी मजदूर पैदल निकल पड़े। किसी ने 300 किलोमीटर का सफर तय किया, किसी ने 800 किलोमीटर का, तो किसी ने 1200 किलोमीटर तक पैदल चलकर गांव पहुंचने की कोशिश की।
मई 2020 में औरैया सड़क हादसे में 26 मजदूरों की मौत हुई। औरंगाबाद में रेल पटरी पर सोए 16 मजदूर ट्रेन से कट गए। संसद में जब सरकार से पूछा गया कि लॉकडाउन के दौरान कितने प्रवासी मजदूर मरे, जवाब मिला कि सरकार के पास कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।
देश में लगभग 47 करोड़ से ज्यादा श्रमिक कार्यबल है, लेकिन उनमें से करीब 90 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में हैं। यानी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास न स्थायी नौकरी है, न पेंशन, न स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही रोजगार की कोई गारंटी।
2016 की नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्टों और विभिन्न आर्थिक अध्ययनों में छोटे और अनौपचारिक कारोबारों पर गहरा असर दर्ज किया गया। लाखों छोटे व्यापार नकदी संकट में फंस गए।
फिर जीएसटी आया, जिसकी जटिल प्रक्रिया ने छोटे दुकानदारों और लघु उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ डाला।
मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2005 में मनरेगा लागू हुआ। आज तक इस योजना के तहत 15 करोड़ से अधिक जॉब कार्डधारी परिवारों को रोजगार मिल चुका है।
2020-21 में अकेले मनरेगा के तहत लगभग 389 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ, जो रिकॉर्ड स्तर था। यह बताता है कि संकट के समय देश का गरीब आज भी सरकारी रोजगार गारंटी पर निर्भर है।
आज मजदूर की हालत देखिए। 2014 में घरेलू एलपीजी सिलेंडर करीब 410 रुपये था। कई शहरों में यह 1200 रुपये के आसपास पहुंच गया। खाद्य तेल, दाल, दूध, सब्जियां, स्कूल फीस, किराया सब बढ़ा। लेकिन असंगठित क्षेत्र में मजदूरी की वृद्धि महंगाई की रफ्तार से पीछे रही।
सवाल यह है कि अगर भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है, तो मजदूर का बेटा अब भी दिहाड़ी मजदूर क्यों बन रहा है। अगर विकास इतना तेज है तो करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में दर-दर क्यों भटक रहे हैं।
अगर अर्थव्यवस्था मजबूत है तो संकट आते ही सबसे पहले मजदूर ही सड़क पर क्यों दिखाई देता है। मजदूर दिवस पर मालाएं चढ़ाने से पहले इन सवालों का जवाब चाहिए।
देश की जीडीपी रिपोर्ट मंत्री लिख सकते हैं, लेकिन देश की असली कहानी आज भी मजदूर अपने पसीने से लिखता है।
05/06/2026
एक बार थोड़ा सा समय निकाल कर इस लेख को अवश्य पढ़े....🙏
पहले बच्चों को घर में समझाया जाता था कि गाँव/मोहल्ले की लड़की बहन के समान है, कहीं जरुरत पड़े तो उसकी रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है,
परिवार के बच्चो को सही या गलत पर टोकने का हक सभी जन का था पर अब परिवार में ही बच्चो के गलत होने पर देखते हुए भी परिवारजन भी नही बोल सकते ,
मेरी लडकी है या मेरा लड़का है तुमसे क्या मतलब जैसी कड़वी बाते सुना देते है मां बाप...
नतीजन
आज आधुनिकता के नाम पर स्कूल से घर आते ही 8 साल के बच्चे से उसी की माँ बत्तीसी दिखाकर पूछती है, कोई गर्ल फ्रेंड बनाई या नहीं? साथ में बैठा बाप भी टोकने की बजाय हँसता है....
घर से नारी सम्मान के संस्कारों की जगह नारी भोग की मानसिकता का विष पिलाया जा रहा है। ऐसे संस्कार राम राज्य नहीं बल्की विनाश काल के राज्य का निर्माण करेंगे☝️
पहले नौजवान कालेज जाते... सगी बहन तो छोड़िए, गाँव की लड़की की ओर आँख उठाकर देखने वालो को ढंग से समझा देते थे...उनमें से बहुत सारे ,पीड़ित लड़की को शक्ल से पहचानते तक नहीं होते थे
मगर गाँव की लड़की है बस यही सोच और संस्कार उन्हें उस बहन के सम्मान की खातिर जान पर खेलने से भी परहेज नहीं करने देते थे।
और आज की मानसिकता देखिए...
पड़ोस का आवारा किसी दूर स्थान के आवारा से यह कहता अमूमन मिल जाएगा कि हमसे तो पटती नहीं, भाई तु पटा ले🤔........ ...... ......... ...... ......... ...... ..... ..... .....
प्रश्न विचारणीय है साथियों!
अपने घर-परिवार को बदलो देश बदलते देर नहीं लगेगी!
जिन बुजुर्गों के विचारों को हम रद्दी की टोकरी में फेंक आये और आधुनिकता के नाम पर नंगापन और फूहड़ता को ढोते फिर रहे हैं, ऐसी आधुनिकता किस काम की जिसमें हमारी बहन बेटियां ही सुरक्षित नहीं है।
#प्रियंका
05/06/2026
सिंधु घाटी सभ्यता से पहले भारत कैसा था? जब हम भारतीय इतिहास के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले मोहनजोदड़ो की पक्की ईंटों वाले घर, शानदार नालियां और विशाल स्नानागार (Great Bath) आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस आलीशान शहर के बसने से पहले हमारा भारत कैसा दिखता था? जब कोई राजा नहीं था, कोई लिपि नहीं थी और न ही कोई चमचमाता हुआ शहर था तब लोग कहाँ रहते थे? वे क्या खाते थे और कैसे सर्वाइव करते थे? चलिए, घड़ी की सुइयों को लाखों साल पीछे घुमाते हैं। खुद को संभाल लीजिए, क्योंकि हम एक ऐसे सफर पर निकल रहे हैं जहाँ इतिहास की किताबें बंद होती हैं और पत्थरों की अनकही दास्तान शुरू होती है।
लाखों साल पहले, अफ्रीका से चलकर आदिमानव भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचे। इस दौर को हम पुरापाषाण काल (Paleolithic Age) या 'पुराना पत्थर काल' कहते हैं। इस समय का इंसान कोई घर बनाना नहीं जानता था। उनका बस एक ही मकसद था—पेट भरना। वे शिकारी थे और कंदमूल इकट्ठा करते थे। उनकी तकनीक बहुत साधारण थी। उन्होंने क्वार्टजाइट (एक मजबूत पत्थर) से कुल्हाड़ियाँ और स्क्रेपर्स (खुरचनी) बनाए। रॉबर्ट ब्रूस फुटे नाम के एक ब्रिटिश भूवैज्ञानिक 1863 में चेन्नई के पास पल्लवरम में घूम रहे थे। अचानक उन्हें मिट्टी में दबा एक अजीब पत्थर मिला। वह कोई आम पत्थर नहीं, बल्कि आदिमानव की बनाई कुल्हाड़ी थी! इस एक खोज ने साबित कर दिया कि भारत का इतिहास लाखों साल पुराना है।
अब समय की रफ़्तार थोड़ी तेज करते हैं। हम आ पहुंचे हैं आज से करीब 30,000 साल पहले, मध्य प्रदेश के विंध्य पहाड़ों में। मौसम ठंडा है और रिमझिम बारिश हो रही है। आप एक बड़ी सी प्राकृतिक गुफा के अंदर खड़े हैं। बाहर अंधेरा बढ़ रहा है। गुफा के कोने में आग जल रही है। एक आदिमानव जंगली जानवरों की चर्बी, पेड़ के रस और गेरू (लाल मिट्टी) को मिलाकर रंग तैयार कर रहा है। वह अपनी उंगलियों से गुफा की दीवार पर एक दौड़ते हुए हिरण का चित्र बनाता है। ये भीमबेटका की गुफाएँ हैं। 1957 में मशहूर पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ट्रेन से भोपाल जा रहे थे। उन्होंने खिड़की से इन अजीब पहाड़ियों को देखा और ठहर गए। जब वे वहाँ पहुंचे, तो इतिहास देखकर दंग रह गए। इन दीवारों पर इंसानों ने अपनी खुशियाँ, डर, शिकार के तरीके और नाचने-गाने के दृश्यों को हमेशा के लिए अमर कर दिया था। यह दुनिया का सबसे पहला 'आर्ट गैलरी' था।
लगभग 10,000 ईसा पूर्व (B.C.) के आसपास धरती का मिजाज बदला। बर्फ पिघली, मौसम गर्म हुआ और चारों तरफ हरी-भरी घास उगने लगी। अब बड़े-बड़े भारी जानवरों की जगह छोटे और तेज भागने वाले जानवर जैसे हिरण, खरगोश और पक्षी आ गए। इंसान ने भी अपनी रणनीति बदली। इस दौर को मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) कहा गया। अब भारी पत्थरों की जगह छोटे, नुकीले और बेहद धारदार पत्थरों के औजार बनने लगे, जिन्हें माइक्रोथिक्स कहा जाता था। इन्हें हड्डियों या लकड़ी के डंडे पर बांधकर तीर-कमान या भाला बनाया जाता था। इसी समय का इंसान का एक नया दोस्त बना। इसी दौर में इंसान ने इतिहास की सबसे बड़ी पार्टनरशिप की उन्होंने कुत्ते को अपना पहला पालतू जानवर बनाया। अब शिकार आसान हो गया था।
अब हम इतिहास के उस मोड़ पर हैं जिसने सब कुछ बदल दिया। इसे इतिहासकार नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) कहते हैं। कल्पना कीजिए एक महिला गुफा के बाहर बैठी है। कुछ दिन पहले उसने कुछ जंगली अनाज के दाने जमीन पर गिरते देखे थे। आज वह देखती है कि वहाँ छोटे-छोटे पौधे उग आए हैं। उसके चेहरे पर एक जादुई मुस्कान आती है। उसे समझ आ गया है अब भोजन की तलाश में भटकने की जरूरत नहीं, भोजन खुद उगाया जा सकता है! खेती की शुरुआत होते ही इंसान की जिंदगी बदल गई। जब आप फसल बोते हैं, तो उसकी देखभाल के लिए महीनों एक ही जगह रुकना पड़ता है। इसलिए इंसानों ने घास-फूस और गारे (मिट्टी) के गोल या चौकोर घर बनाने शुरू किए। गाय, भेड़ और बकरियों को दूध और मांस के लिए पाला जाने लगा। अनाज को रखने के लिए मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) बनाए गए। इसी समय 'पहिए' का आविष्कार हुआ, जिसने इंसान को रफ्तार दे दी।
आज के पाकिस्तान के बलूचिस्तान में एक जगह है मेहरगढ़। फ्रांसीसी पुरातत्वविद् जीन-फ्रेंकोइस जारिज ने जब 1974 में यहाँ खुदाई शुरू की, तो उन्हें उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी रीढ़ मिली। लगभग 7,000 ईसा पूर्व में यहाँ के लोग गेहूं और जौ उगा रहे थे, कपास की खेती कर रहे थे और पक्की मिट्टी के घरों में रह रहे थे। यहाँ तक कि एक कंकाल ऐसा मिला जिसके दांतों में ड्रिलिंग (डेंटिस्ट्री) के निशान थे! सोचिए, उस जमाने के लोग इलाज करना भी सीख रहे थे।
पत्थरों के साथ खेलते-खेलते इंसान की नजर एक चमकदार चीज पर पड़ी यह ताँबा (Copper) था। यह इंसान द्वारा खोजी गई सबसे पहली धातु थी। इस काल को ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age) यानी पत्थर और ताँबे का मिला-जुला दौर कहा जाता है। भारत में अहार (राजस्थान), कायथा और मालवा (मध्य प्रदेश), और जोर्वे (महाराष्ट्र) जैसी ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ पनपीं। ये लोग बड़े पैमाने पर खेती करते थे। वे मातृदेवी (Mother Goddess) और बैल की पूजा करते थे। खुदाई में मिले बर्तनों पर सुंदर चित्रकारी देखने को मिलती है। हालांकि, ये लोग अभी भी गांवों में ही रह रहे थे, शहरों का जादू अभी बाकी था।
अब ये छोटे-छोटे गांव, मेहरगढ़ जैसी बस्तियाँ और ताँबे का इस्तेमाल करने वाले लोग धीरे-धीरे आपस में जुड़ने लगे। व्यापार बढ़ा, आबादी बढ़ी और लोग नदियों के किनारे इकट्ठा होने लगे। सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदानों ने इन ग्रामीण संस्कृतियों को एक ऐसा बूस्ट दिया कि वे 'शहरी' बनने की ओर चल पड़ीं। यही वह बैकग्राउंड था जिसने दुनिया की सबसे व्यवस्थित और महान सभ्यतासिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के जन्म की जमीन तैयार की।
शायद आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि इस पूरे सफर को हम 'प्रोटोहिस्ट्री' क्यों कह रहे हैं? इसे समझने के लिए प्रागैतिहासिक और आद्य-इतिहास के अंतर को जानना होगा। प्रागितिहास (Prehistory) उस समय का मानव इतिहास है जिसके बारे में हमारे पास कोई लिखित दस्तावेज नहीं है। हम सिर्फ पत्थरों और हड्डियों पर निर्भर हैं, जैसे पुरापाषाण काल से नवपाषाण काल (भीमबेटका, मेहरगढ़)। आद्य-इतिहास (Protohistory) वह दौर है जब लोगों को लिखना तो आता था, लेकिन हम आज तक उनकी उस लिखावट या लिपि को पढ़ नहीं पाए हैं, जैसे सिंधु घाटी सभ्यता (उनकी लिपि आज भी एक रहस्य है)। इतिहास (History) वह दौर है जिसके लिखित दस्तावेज मौजूद हैं और जिन्हें हम आसानी से पढ़ और समझ सकते हैं, जैसे सम्राट अशोक के शिलालेख, गुप्त साम्राज्य के सिक्के और ग्रंथ।
सिंधु घाटी सभ्यता को भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ (Turning Point) माना जाता है क्योंकि इसने भारत को उसकी पहली 'शहरी क्रांति' दी। जहाँ लोग झोपड़ियों में रहते थे, वहाँ अचानक शतरंज की बिसात जैसे ग्रिड पैटर्न पर बसे शहर, दो मंजिला मकान और कवर्ड ड्रेनेज सिस्टम दिखाई देने लगा। इस सभ्यता ने भारत को समकालीन मिस्र (Egypt) और मेसोपोटामिया की महान सभ्यताओं के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। आज हम जो पशुपति (शिव), पीपल की पूजा, स्वास्तिक का चिह्न और चूड़ियाँ पहनते हैं, उन सब की जड़ें इसी आद्य-इतिहास (Protohistory) में छिपी हैं। तो अगली बार जब आप इतिहास की किताबों में सिंधु घाटी के शहर देखें, तो याद रखिएगा कि उस भव्य इमारत की नींव लाखों साल पहले भीमबेटका की अंधेरी गुफाओं और मेहरगढ़ के खेतों में हमारे पूर्वजों ने अपने पसीने से रखी थी!
अगले भाग के लिए next कमेंट करें।।
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