Bhakti Ganga Vlog
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02/09/2024
*सनातन नियम-धर्म 🔆 क्या करें-क्या ना करें*
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१. भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।
२. भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।
३. देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।
४. किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।
५. एकादशी,अमावस्या,कृृष्ण चतुर्दशी,पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए।
६. बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।
७. शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।
८. शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ते।
९. शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा,देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।
१०. अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।
११. एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।
१२. सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
१३. बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छू कर प्रणाम करें।
१४. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।
१५. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।
१६. जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।
१७. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।
१८. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।
१९. यज्ञ,श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।
२०. शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है।
२१. नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।
२२. विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।
२३. पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।
२४. बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।
२५. पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।
२६. सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।
२७. गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।
२८. पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।
२९. दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।
३०. सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।
३१. पूजन करने वाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।
३२. पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा,धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।
३३. घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चावल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।
३४. गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।
३५. कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।
३६. बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।
३७. रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।
३८. केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।
३९. केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।
४०. देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।
४१. शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।
४२. जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।
४३. तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।
४४. पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।
४५. मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।
४६. कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।
४७. पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल गाय के दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।
४८. शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।
४९. हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।
५०. पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।
५१. प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।
५२. आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र, संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।
५३. जो मलिन वस्त्र पहनकर,मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो,जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।
५४. मिट्टी,गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।
*🌹जय सनातन धर्म🌹*
*🌹जय सनातन संस्कृति🌹*
24/08/2024
*🚩🙏 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर संपूर्ण पूजन विधि इस प्रकार होगी अक्षय पुण्य की प्राप्ति*⤵️
जन्माष्टमी
*26 अगस्त 2024 सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।*
भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है | - ब्रह्मवैवर्त पुराण
*गर्भवती देवी के लिये–जन्माष्टमी व्रत*
👩🏻जो गर्भवती देवी जन्माष्टमी का व्रत करती हैं..... उसका गर्भ ठीक से पेट में रह सकता है और ठीक समय जन्म होता है..... ऐसा भविष्यपुराण में लिखा है |
*20 करोड एकादशी का फल देनेवाला व्रत*
जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात, जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्व है ।
*भविष्य पुराण में लिखा है कि जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उनके घर में गर्भपात नहीं होता ।*
एकादशी का व्रत हजारों - लाखों पाप नष्ट करनेवाला अदभुत ईश्वरीय वरदान है
*एकादशी के दिन जो संयम होता है उससे ज्यादा संयम जन्माष्टमी को होना चाहिए ।*
बाजारु वस्तु तो वैसे भी साधक के लिए विष है लेकिन जन्माष्टमी के दिन तो चटोरापन, चाय, नाश्ता या इधर - उधर का कचरा अपने मुख में न डालें ।
*इस दिन तो उपवास का आत्मिक अमृत पान करें ।अन्न, जल, तो रोज खाते - पीते रहते हैं, अब परमात्मा का रस ही पियें । अपने अहं को खाकर समाप्त कर दें।*
जन्माष्टमी
*ज्योतिष के अनुसार, अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं तो माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ये उपाय करने से मनोकामना की पूर्ति व धन प्राप्ति के योग भी बन सकते हैं।*
ये हैं जन्माष्टमी के अचूक 12 उपाय, 1 भी करेंगे तो होगा फायदा
1⃣ *आमदनी नहीं बढ़ रही है या नौकरी में प्रमोशन नहीं हो रहा है तो जन्माष्टमी पर 7 कन्याओं को घर बुलाकर खीर या सफेद मिठाई खिलाएं। इसके बाद लगातार पांच शुक्रवार तक सात कन्याओं को खीर या सफेद मिठाई बांटें।*
2⃣ जन्माष्टमी से शुरु कर 27 दिन लगातार नारियल व बादाम किसी कृष्ण मंदिर में चढ़ाने से सभी इच्छाएं पूरी हो सकती है।
3⃣ *यदि पैसे की समस्या चल रही हो तो जन्माष्टमी पर सुबह स्नान आदि करने के बाद राधाकृष्ण मंदिर जाकर दर्शन करें व पीले फूलों की माला अर्पित करें। इससे आपकी परेशानी कम हो सकती है।*
4⃣ सुख-समृद्धि पाने के लिए जन्माष्टमी पर पीले चंदन या केसर से गुलाब जल मिलाकर माथे पर टीका अथवा बिंदी लगाएं। ऐसा रोज करें। इस उपाय से मन को शांति प्राप्ति होगी और जीवन में सुख-समृद्धि आने के योग बनेंगे।
5⃣ *लक्ष्मी कृपा पाने के लिए जन्माष्टमी पर कहीं केले के पौधे लगा दें। बाद में उनकी नियमित देखभाल करते रहे। जब पौधे फल देने लगे तो इसका दान करें, स्वयं न खाएं।*
6⃣ जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता भेंट करें और उसके बाद इस पत्ते पर रोली (कुमकुम) से श्री यंत्र लिखकर तिजोरी में रख लें। इस उपाय से धन वृद्धि के योग बन सकते हैं।
7⃣ *जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को सफेद मिठाई या खीर का भोग लगाएं।इसमें तुलसी के पत्ते अवश्य डालें। इससे भगवान श्रीकृष्ण जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं।*
8⃣ जन्माष्टमी पर दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें। इस उपाय से मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। ये उपाय करने वाले की हर इच्छा पूरी हो सकती है।
9⃣ *कृष्ण मंदिर जाकर तुलसी की माला से नीचे लिखे मंत्र की 11 माला जप करें। इस उपाय से आपकी हर समस्या का समाधान हो सकताहै।*
*मंत्र- क्लीं कृष्णाय वासुदेवाय हरि:परमात्मने* *प्रणत:क्लेशनाशाय गोविंदय नमो नम:*
🔟 भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहते हैं, जिसका अर्थ है पीले रंग के कपड़े पहनने वाला। जन्माष्टमी पर पीले रंग के कपड़े, पीले फल व पीला अनाज दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न होते हैं।
1⃣1⃣ *जन्माष्टमी की रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करें तो जीवन में सुख-समृद्धि आने के योग बनाते हैं।*
1⃣2⃣ जन्माष्टमी को शाम के समय तुलसी को गाय के घी का दीपक लगाएं और ॐ वासुदेवाय नम: मंत्र बोलते हुए तुलसी की 11 परिक्रमा करें।
*कृष्ण नाम के उच्चारण का फल*
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार
*नाम्नां सहस्रं दिव्यानां त्रिरावृत्त्या चयत्फलम् ।।*
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः । कृष्णनाम्नः परं नाम न भूतं न भविष्यति ।।
*सर्वेभ्यश्च परं नाम कृष्णेति वैदिका विदुः । कृष्ण कृष्णोति हे गोपि यस्तं स्मरति नित्यशः ।।*
जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धरेच्च सः । कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते ।।
*भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटयः ।* *अश्वमेधसहस्रेभ्यः फलं कृष्णजपस्य च ।।*
वरं तेभ्यः पुनर्जन्म नातो भक्तपुनर्भवः । सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षाणि च व्रतानि च ।।
*तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च ।* *वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुवः शतम् ।।*
कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । (ब्रह्मवैवर्तपुराणम्, अध्यायः-१११)
*विष्णुजी के सहस्र दिव्य नामों की तीन आवृत्ति करने से जो फल प्राप्त होता है; वह फल ‘कृष्ण’ नाम की एक आवृत्ति से ही मनुष्य को सुलभ हो जाता है। वैदिकों का कथन है कि ‘कृष्ण’ नाम से बढ़कर दूसरा नाम न हुआ है, न होगा। ‘कृष्ण’ नाम सभी नामों से परे है। हे गोपी! जो मनुष्य ‘कृष्ण-कृष्ण’ यों कहते हुए नित्य उनका स्मरण करता है; उसका उसी प्रकार नरक से उद्धार हो जाता है, जैसे कमल जल का भेदन करके ऊपर निकल आता है। ‘कृष्ण’ ऐसा मंगल नाम जिसकी वाणी में वर्तमान रहता है, उसके करोड़ों महापातक तुरंत ही भस्म हो जाते हैं। ‘कृष्ण’ नाम-जप का फल सहस्रों अश्वमेघ-यज्ञों के फल से भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उनसे पुनर्जन्म की प्राप्ति होती है; परंतु नाम-जप से भक्त आवागमन से मुक्त हो जाता है। समस्त यज्ञ, लाखों व्रत तीर्थस्नान, सभी प्रकार के तप, उपवास, सहस्रों वेदपाठ, सैकड़ों बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा- ये सभी इस ‘कृष्णनाम’- जप की सोलहवीं कला की समानता नहीं कर सकते*
ब्रह्माण्डपुराण, मध्यम भाग, अध्याय 36 में कहा गया है :
*महस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम् ।*
*एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ॥१९॥*
विष्णु के तीन हजार पवित्र नाम (विष्णुसहस्त्रनाम) जप के द्वारा प्राप्त परिणाम ( पुण्य ), केवलएक बार कृष्ण के पवित्र नाम जप के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।
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18/08/2024
*रक्षाबंधन 2024 पर विशेष लेख*
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*19 अगस्त 2024 सोमवार के दिन रक्षाबंधन का पर्व है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार भद्रा काल में राखी नहीं बांधी जाती है।*
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*भद्रा का वास:-* 19 अगस्त 2024 को भद्रा का वास पाताल लोक में रहेगा। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यदि भद्रा पृथ्वीलोक की हो तो ही इसके नियम मान्य होते हैं। इसलिए अधिकतर ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन कभी भी शुभ मुहूर्त में राखी बांध सकते हैं। भद्राकाल सुबह 09:51 से प्रारंभ होकर दोपहर 01:30 तक रहेगा।
*भद्रा मुख-* सुबह 10:56 से दोपहर 12:37 तक।
*भद्रा अन्त समय-* दोपहर 01:30 से।
*कब बांधें राखी:-* यानी सुबह 09 बजकर 51 मिनट से दोपहर 01 बजकर 30 मिनट के बीच राखी नहीं बांध सकते हैं। इसके बाद शाम 7 बजे के पहले तक राखी बांध सकते हैं क्योंकि शाम 7:00 बजे से पंचक प्रारंभ होंगे। इसलिए शाम 7 के पहले ही राखी बांध लें।
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*🌻रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:-*
*अभिजीत मुहूर्त:-* सुबह 11:58 से दोपहर 12:51 तक।
*विजय मुहूर्त:-* दोपहर 02:35 से दोपहर 03:27 तक।
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*गोधूलि मुहूर्त:-* शाम 06:56 से 07:18 तक।
*रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त:-* शाम 06:56:06 से रात्रि 09:07:31 तक।
*सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त:-* मध्याह्न 3:30 से 6:45 मिनट तक।
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17/08/2024
*सुंदरकांड के पाठ के लाभ*
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*प्रभु श्री हनुमान जी को कोटि कोटि प्रणाम*
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* सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥
1. सुन्दरकाण्ड का पाठ ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी से जुड़ा कोई भी मंत्र या पाठ अन्य किसी भी मंत्र से अधिक शक्तिशाली होता है। हनुमान जी अपने भक्तों को उनकी उपासना के फल में बल और शक्ति प्रदान करते हैं।
2. सुन्दरकाण्ड के लाभ लेकिन आज हम विशेष रूप से सुंदरकांड पाठ के महत्व और उससे मिलने वाले लाभ पर बात करेंगे। भक्तों द्वारा हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए अमूमन हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है। हनुमान चालीसा बड़े-बूढ़ों से लेकर बच्चों तक को जल्दी याद हो जाता है।
3. हनुमान चालीसा लेकिन हनुमान चालीसा के अलावा यदि आप सुंदरकांड पाठ के लाभ जान लेंगे तो इसे रोजाना करना पसंद करेंगे। हिन्दू धर्म की प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार सुंदरकांड का पाठ करने वाले भक्त की मनोकामना जल्द पूर्ण हो जाती है।
4. सुंदरकांड अध्याय सुंदरकांड, गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामचरितमानस के सात अध्यायों में से पांचवा अध्याय है। रामचरित मानस के सभी अध्याय भगवान की भक्ति के लिए हैं, लेकिन सुंदरकांड का महत्व अधिक बताया गया है।
5. सुंदरकांड पाठ का महत्व जहां एक ओर पूर्ण रामचरितमानस में भगवान के गुणों को दर्शाया गया है, उनकी महिमा बताई गई है लेकिन दूसरी ओर रामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। इसमें भगवान राम के गुणों की नहीं बल्कि उनके भक्त के गुणों और उसकी विजय की बात बताई गई है।
6. हनुमान पाठ के लाभ सुंदरकांड का पाठ करने वाले भक्त को हनुमान जी बल प्रदान करते हैं। उसके आसपास भी नकारात्मक शक्ति भटक नहीं सकती, इस तरह की शक्ति प्राप्त करता है वह भक्त। यह भी माना जाता है कि जब भक्त का आत्मविश्वास कम हो जाए या जीवन में कोई काम ना बन रहा हो, तो सुंदरकांड का पाठ करने से सभी काम अपने आप ही बनने लगते हैं।
7. शास्त्रीय मान्यताएं किंतु केवल शास्त्रीय मान्यताओं ने ही नहीं, विज्ञान ने भी सुंदरकांड के पाठ के महत्व को समझाया है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों की राय में सुंदरकांड का पाठ भक्त के आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।
8. सुंदराकांड पाठ का अर्थ इस पाठ की एक-एक पंक्ति और उससे जुड़ा अर्थ, भक्त को जीवन में कभी ना हार मानने की सीख प्रदान करता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी बड़ी परीक्षा में सफल होना हो तो परीक्षा से पहले सुंदरकांड का पाठ अवश्य करना चाहिए।
9. सुंदराकांड पाठ का महत्व यदि संभव हो तो विद्यार्थियों को सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। यह पाठ उनके भीतर आत्मविश्वास को जगाएगा और उन्हें सफलता के और करीब ले जाएगा।
10. सफलता के सूत्र आपको शायद मालूम ना हो, लेकिन यदि आप सुंदरकांड के पाठ की पंक्तियों के अर्थ जानेंगे तो आपको यह मालूम होगा कि इसमें जीवन की सफलता के सूत्र भी बताए गए हैं।
11. सफल जीवन के मंत्र यह सूत्र यदि व्यक्ति अपने जीवन पर अमल कर ले तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए यह राय दी जाती है कि यदि रामचरित्मानस का पूर्ण पाठ कोई ना कर पाए, तो कम से कम सुंदरकांड का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए।
12. इस समय करें सुंदराकांड का पाठ
यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि जब घर पर रामायण पाठ रखा जाए तो उस पूर्ण पाठ में से सुंदरकांड का पाठ घर के किसी सदस्य को ही करना चाहिए। इससे घर में सकारात्मक शक्तियों का प्रवाह होता है।
13. ज्योतिष के लाभ ज्योतिष के नजरिये से यदि देखा जाए तो यह पाठ घर के सभी सदस्यों के ऊपर मंडरा रहे अशुभ ग्रहों छुटकारा दिलाता है। यदि स्वयं यह पाठ ना कर सकें, तो कम से कम घर के सभी सदस्यों को यह पाठ सुनना जरूर चाहिए। अशुभ ग्रहों का दोष दूर करने में लाभकारी है सुंदरकांड का पाठ।
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*प्रभु श्रीराम जी को कोटि कोटि प्रणाम*
17/08/2024
🛕सत्य को चुनें🛕
🙌जय श्री कृष्णा🙌
सत्य का मार्ग ही सृजन का मार्ग है,सत्य का मार्ग ही साहस का मार्ग है और सत्य का मार्ग ही आत्मकल्याण का मार्ग भी है।
गलत दिशा की ओर हजार कदम चलने की अपेक्षा लक्ष्य की ओर चार कदम चलना श्रेष्ठ है।
सत्य के मार्ग में विघ्न - बाधाएँ अवश्य आयेंगी पर जीवन दिग्भ्रमित होने से बच जायेगा।
जीवन में लक्ष्य विहीन गति का नाम ही तो भटकाव है।
सत्य के मार्ग का अनुकरण सबके बस की बात नहीं इसलिए सत्य का मार्ग आपको दुनिया की भीड़ से भी बचा लेता है।
सत्य के मार्ग पर चलने से व्यर्थ उसी प्रकार छूट जाता है जिस प्रकार सूर्योदय होने से अंधकार स्वतः मिट जाता है।केवल गति महत्वपूर्ण नहीं, श्रेष्ठ मार्ग का चयन भी महत्वपूर्ण है।
जो सत्य की राह पर चलते हैं उन्हें एक दिन सच्चिदानंद अवश्य मिल जाते हैं
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जिस स्थानमें सच्चे साधु लोग अधिक बसते हैं, चाहे वे वाणीसे कोई भी उपदेश न देते हों या किसी से मिलते-जुलते भी न हों, उस स्थानका वायुमंडल शुद्ध और साधु भावोंसे भरा रहता है। जहाँ इसके विपरीत चोर-डाकू, हत्यारा, व्यभिचारी, कपटी, कामी मनुष्य रहते हैं, वहाँ का वायुमंडल उन लोगों के ऊपर से अच्छे-अच्छे उपदेशकी बातें कहने पर भी दूषित रहता है। जो सर्वथा लोक समाज से अलग और मौन रहते हैं, परंतु जिनका अंतःकरण केवल भगवद्भावोंसे भरा होता है, उनके अंदर से निकली हुई भगवद्भावों की किरणें सारे वायुमंडलमें फैलकर वहाँ सर्वत्र सदाचार, साधुशील और भगवत्प्रेम की ज्योति छिटका देती हैं और उसके प्रकाशको पाकर पामर प्राणी भी कृतार्थ हो जाते हैं।
🏵️जय श्री कृष्णा🏵️
16/08/2024
🏵️जय श्री कृष्णा🏵️
*भगवद्गीता– अध्याय ४, श्लोक १-३*
श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप ||
स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन: |
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||
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अनुवाद: श्रीभगवान ने कहा, "मैंने यह अविनाशी योग सूर्यदेव को सिखाया, जिन्होंने इसे मनु को बताया, और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया।
हे शत्रु विनाशक! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; परन्तु, बहुत समय बीत जाने के कारण यह योग इस लोक में लुप्तप्राय हो गया।
वह पुरातन योग, जो वास्तव में सर्वोच्च रहस्य है, आज मैंने तुम्हें सिखाया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो।"
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*भगवद्गीता– अध्याय २, श्लोक २०*
न जायते म्रियते वा कदाचि
नायं भूत्वा भविता वा न भूय: |
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||
अनुवाद: आत्मा का न तो कभी जन्म होता है न ही मृत्यु होती है और न ही एक बार अस्तित्व में आने के बाद उसका अस्तित्व समाप्त होता है।
आत्मा अजन्मा, शाश्वत, अजर और अमर है।
शरीर के नष्ट हो जाने पर भी यह नष्ट नहीं होता।
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🏵️जय श्री कृष्णा🏵️
16/08/2024
*सनातन धर्म की कुछ महत्वपूर्ण जानकारी जो हर हिंदू को पता होना चाहिए...*
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🙌1. 10 ध्वनियां :-🙌
1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग
2. 10 कर्तव्य :-
1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार।
3. 10 दिशाएं :-
दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो।
4. 10 दिग्पाल :-
10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।
5. 10 देवीय आत्मा :-
1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवाअश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.यति, 10.मकर।
6. 10 देवीय वस्तुएं :-
1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि
10 संजीवनी बूटी
7. 10 पवित्र पेय :-
1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस
8. 10 महाविद्या :-
1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।
9. 10 उत्सव :-
1 नवसंवत्सर, 2 मकरौ संक्रांति, 3 वसंत पंचमी, 4 पोंगल, 5 होली, 6 दीपावली, 7 रामनवमी, 8 कृष्ण जन्माष्टमी, 9 महाशिवरात्री
10 नवरात्रि।
10. 10 बाल पुस्तकें :-
1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।
11. 10 पूजा :-
1 गंगा दशहरा
2 आंवला नवमी पूजा
3 वट सावित्री
4 तुलसी विवाह पूजाऔ
5 शीतलाष्टमी
6 गोवर्धन पूजा
7 हरतालिका तिज
8 दुर्गा पूजा
9 भैरव पूजा
10 छठ पूजा
12. 10 धार्मिक स्थल :-
(१) 12 ज्योतिर्लिंग
(२) 51 शक्तिपीठ
(३) 4 धाम
(४) 7 पुरी
(५) 7 नगरी
(६) 4 मठ,आश्रम
(७) 10 समाधि स्थल
(८) 5 सरोवर
(९) 10 पर्वत
(१०)10 गुफाए
13. 10 पूजा के फूल :-
1 आंकड़ा
2 गेंदा
3 पारिजात
4 चंपा
5 कमल
6 गुलाब
7 चमेली
8 गुड़हल
9 कनेर
10 रजनीगंधा
14. 10 धार्मिक सुगंध :-
1 गुग्गुल
2 चंदन
3 गुलाब
4 केसर
5 कर्पूर
6 अष्टगंथ
7 गुढ़-घी
8 समिधा
9 मेहंदी
10 चमेली।
15. 10 यम-नियम :-
1.अहिंसा
2.सत्य
3.अस्तेय
4.ब्रह्मचर्य
5.अपरिग्रह
6.शौच
7.संतोष
8.तप
9.स्वाध्याय
10.ईश्वर-प्रणिधान
16. 10 सिद्धांत :-
1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्वर है दूसरा नहीं)
2.आत्मा अमर है
3.पुनर्जन्म होता है
4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है
5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है
6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है
7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है
8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है
9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है
10.दान ही पुण
🏵️सत्य सनातन धर्म🏵️
14/08/2024
*🚩जय श्री सीताराम जी की*🚩
🙏🏵️🛕🏵️🙏
*आप सभी श्रीसीतारामजीके भक्तों को प्रणाम*
🙏🙌🙏
*श्री रामचरित मानस उत्तर काण्ड*
*शिव-पार्वती संवावद, गरुड़ मोह, गरुड़जी का काकभुशुण्डि से रामकथा और राम महिमा सुनना*
======================
चौपाई
*गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा।*
*मैं सब कही मोरि मति जथा॥*
*राम चरित सत कोटि अपारा।*
*श्रुति सारदा न बरनै पारा॥१॥*
भावार्थ :
(शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली।श्री रामजी के चरित्र सौ करोड़ (अथवा) अपार हैं।
श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते॥१॥
*राम अनंत अनंत गुनानी।*
*जन्म कर्म अनंत नामानी॥*
*जल सीकर महि रज गनि जाहीं।*
*रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥२॥*
भावार्थ :
भगवान् श्री राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, जन्म, कर्म और नाम भी अनंत हैं।जल की बूँदें और पृथ्वी के रजकण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्री रघुनाथजी के चरित्र वर्णन करने से नहीं चूकते॥२॥
*बिमल कथा हरि पद दायनी।*
*भगति होइ सुनि अनपायनी॥*
*उमा कहिउँ सब कथा सुहाई।*
*जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥३॥*
भावार्थ :
यह पवित्र कथा भगवान् के परम पद को देने वाली है।इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है।
हे उमा! मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को सुनाई थी॥३॥
*कछुक राम गुन कहेउँ बखानी।*
*अब का कहौं सो कहहु भवानी॥*
*सुनि सुभ कथा उमा हरषानी।*
*बोली अति बिनीत मृदु बानी॥४॥*
भावार्थ :
मैंने श्री रामजी के कुछ थोड़े से गुण बखान कर कहे हैं।
हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ? श्री रामजी की मंगलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यंत विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं-॥४॥
*धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी।*
*सुनेउँ राम गुन भव भय हारी*॥५॥
भावार्थ :
हे त्रिपुरारि।मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्यु के भय को हरण करने वाले श्री रामजी के गुण (चरित्र) सुने॥५॥
दोहा :
*तुम्हरी कृपाँ कृपायतन*
*अब कृतकृत्य न मोह।*
*जानेउँ राम प्रताप प्रभु*
*चिदानंद संदोह॥५२ क॥*
भावार्थ :
हे कृपाधाम।अब आपकी कृपा से मैं कृतकृत्य हो गई।
अब मुझे मोह नहीं रह गया।
हे प्रभु! मैं सच्चिदानंदघन प्रभु श्री रामजी के प्रताप को जान गई॥५२ (क)॥
*नाथ तवानन ससि स्रवत*
*कथा सुधा रघुबीर।*
*श्रवन पुटन्हि मन पान करि*
*नहिं अघात मतिधीर॥५२ ख॥*
भावार्थ :
हे नाथ! आपका मुख रूपी चंद्रमा श्री रघुवीर की कथा रूपी अमृत बरसाता है।हे मतिधीर मेरा मन कर्णपुटों से उसे पीकर तृप्त नहीं होता॥५२ (ख)॥
चौपाई
*राम चरित जे सुनत अघाहीं।*
*रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥*
*जीवनमुक्त महामुनि जेऊ।*
*हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥१॥*
भावार्थ :
श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं।जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान् के गुण निरंतर सुनते रहते हैं॥१॥
*भव सागर चह पार जो पावा।*
*राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥*
*बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा।*
*श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥२॥*
भावार्थ :
जो संसार रूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिए तो श्री रामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है। श्री हरि के गुणसमूह तो विषयी लोगों के लिए भी कानों को सुख देने वाले और मन को आनंद देने वाले हैं॥२॥
*श्रवनवंत अस को जग माहीं।*
*जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥*
*ते जड़ जीव निजात्मक घाती।*
*जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥३॥*
भावार्थ :
जगत् में कान वाला ऐसा कौन है, जिसे श्री रघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्री रघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले हैं॥३॥
*हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा।*
*सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥*
*तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई।*
*कागभुशण्डि गरुड़ प्रति गाई॥४॥*
भावार्थ :
हे नाथ! आपने श्री रामचरित्र मानस का गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया।
आपने जो यह कहा कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कही थी-॥४॥
*🚩जय श्री सीताराम जी की*🚩
13/08/2024
*एक बार श्रीकृष्ण एक भक्त के घर स्वयं पधारे।*
🙌राधे राधे कृष्णा🙌
★भक्त से कृष्ण ने पूछा ये घर किसका है?
🏵️भक्त -: प्रभू आपका
श्रीकृष्ण : "ये गाड़ी किसकी है?"
🏵️भक्त : "आपकी" फिर श्रीकृष्ण ने हर एक वस्तु के बारे में पूछा।
🏵️भक्त का एक ही उतर मिलता 'आपकी'। यहाँ तक घर के सभी सदस्य के लिए भी पूछा भक्त का फिर वही जबाब 'आपके'।
🏵️पूछा तेरा शरीर किसका? भक्त : "आपका"
फिर घर के पूजा स्थान पर जाकर श्रीकृष्ण जी अपनी तस्वीर की ओर इशारा करते हुये पूछते हैं ये किसकी है? अब भक्त की भक्ति की पराकाष्ठा देखिये ....
🏵️भक्त आँखों में आँसू लिए बोला सिर्फ ये ही मेरे हैं बाकि सब आपका भगवान्।
🏵️तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड और प्राण।
प्रभु सब कुछ तेरा है...बस एक तू ही मेरा है।
====================== राधे-राधे🙌🛕 , जय श्रीकृष्ण🙌🛕🪷
11/08/2024
🛕भागवत गीता🛕
💮अध्याय 2 पार्ट 3💮
💮जय श्री कृष्णा💮
=====================
*(धर्म के अनुसार युद्ध का निरूपण)*
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हे अर्जुन! क्षत्रिय होने के कारण अपने धर्म का विचार करके भी तू संकोच करने योग्य नहीं है, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म के लिये युद्ध करने के अलावा अन्य कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं है।
हे पार्थ! वे क्षत्रिय भाग्यवान है जिन्हे ऎसॆ युद्ध के अवसर अपने-आप प्राप्त होते है जिससे उनके लिये स्वर्ग के द्वार खुल जाते है।
किन्तु यदि तू इस धर्म के लिये युद्ध नहीं करेगा तो अपनी कीर्ति को खोकर कर्तव्य-कर्म की उपेक्षा करने पर पाप को प्राप्त होगा।
लोग सदैव तेरी बहुत समय तक रहने वाली अपकीर्ति का भी वर्णन करेंगे और सम्मानित मनुष्य के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।
जिन-जिन योद्धाओं की दृष्टि में तू पहले सम्मानित हुआ है, वे महारथी लोग तुझे डर के कारण युद्ध-भूमि से हटा हुआ समझ कर तुच्छ मानेंगे।
तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से कटु वचन भी कहेंगे, तेरे लिये इससे अधिक दु:खदायी और क्या हो सकता है?
हे कुन्तीपुत्र! यदि तू युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा और यदि तू युद्ध जीत गया तो पृथ्वी का साम्राज्य भोगेगा, अत: तू दृढ-संकल्प करके खड़ा हो जा और युद्ध कर।
सुख या दुख, हानि या लाभ और विजय या पराजय का विचार त्याग कर युद्ध करने के लिये ही युद्ध कर, ऎसा करने से तू पाप को प्राप्त नही होगा।
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भागवत गीता जय श्री कृष्णा
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11/08/2024
*श्री राम नाम वंदना और महिमा*
प्रभु श्रीराम जी को कोटि कोटि प्रणाम
🙏🛕🙏
बंदउँ नाम राम रघुबर को... मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा का हेतु अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है।
वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है।
वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥
जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥
आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए।
श्री शिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति के साथ राम-नाम का जप करती रहती हैं॥
ये दोनों अक्षर रा और म नर-नारायण के समान सुंदर भाई हैं, ये जगत का पालन और विशेष रूप से भक्तों की रक्षा करने वाले हैं।
ये भक्ति रूपिणी सुंदर स्त्री के कानों के सुंदर आभूषण हैं और जगत के हित के लिए निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं॥
ये सुंदर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करने वाले हैं, भक्तों के मन रूपी सुंदर कमल में विहार करने वाले भौंरे के समान हैं और जीभ रूपी यशोदाजी के लिए श्री कृष्ण और बलरामजी के समान (आनंद देने वाले) हैं॥
चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है।
इसमें तो नाम को छोड़कर दूसरा कोई उपाय ही नहीं है॥ पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥
ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥
> अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है
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सीताराम सीताराम 🙏
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव 🚩
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10/08/2024
💮जय श्री कृष्णा💮
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*प्रभु श्री कृष्णा जी को कोटि कोटि प्रणाम*🙏
🙏🛕🙏
प्रभु श्री कृष्णा जी के भक्ति
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'प्रभो! आप मुझपर ऐसी कृपा करें कि जिससे मुझे अगले जन्ममें भी आपके चरण-कमलोंके आश्रित सेवकोंकी अनन्य भावसे सेवा करनेका अवसर प्राप्त हो।
प्रियतम! मेरा मन आपके मङ्गलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और मेरा शरीर आपकी सेवामें ही लगा रहे।
सर्वसौभाग्यनिधे ! मैं आपको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकाधिपत्य, योगकी सिद्धियाँ, यहाँतक कि पुनर्जन्मनाशक मोक्ष भी नहीं चाहता ।
जैसे पक्षियोंके बिना पंख जमे हुए बच्चे माँकी बाट देखते रहते हैं; जैसे भूखे बछड़े गोमाताका स्तन्य-पान करनेके लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम पतिसे मिलनेके लिये व्याकुल रहती है, वैसे ही कमलनयन ! मैं आपके चरण-दर्शनके लिये छटपटाता रहूँ।
प्रभो! मैं मुक्ति नहीं चाहता। मेरे कर्मोंके फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्युके चक्रमें भले ही भटकना पड़े।
परंतु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनिमें जन्मूँ, वहाँ-वहाँ आपके प्यारे भक्तोंसे मेरी प्रेम- मैत्री बनी रहे।
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स्वामिन्! जो लोग आपकी मायासे घर-शरीर और स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा किसी प्रकारका कभी सम्बन्ध न हो।'
श्रीमद्भा० ६ । ११ । २४ -२७
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🛕जय श्री कृष्णा🛕
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