SandhyaSaroj
Sandhya Saroj ✨
Simple girl with big dreams 💫
Living life my way 💖
22/05/2026
Cockroach jantaparti -z
21/05/2026
17/05/2026
सभी को राधे राधे जय श्री कृष्णा 🙏👍💯🎀
15/05/2026
' #सतयुग_का_सच'
धर्मशास्त्रों के अनुसार 'सतयुग' में धर्म अपने चारों पैर पर खड़ा था।
सत्य, तप, दान और यज्ञ यह धर्म के चार पैर थे।
सर्वत्र सुख था, सर्वत्र संपन्नता थी।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना...
जैसे-2 इंसान का नैतिक पतन होता गया। वैसे-2 धर्म का लोप होता गया। इस लोप के साथ ही धर्म का एक-2 पैर टूटता गया और उसी के साथ युग परिवर्तन होता गया।
त्रेतायुग में धर्म के तीन तथा
द्वापरयुग में दो ही पैर रह गए।
आज कलियुग में तो मात्र एक पैर पर खड़े धर्म की स्थिति यह है कि,
अब गिरा तब गिरा।
आइए! अब धर्मशास्त्रों से परे हटकर अपने दिमाग का दीपक जलाते हुए कथित 'सतयुग' का पोस्टमार्टम करके सच जानने की कोशिश करते हैं।
सतयुग की एक धर्मकथा है सतवादी राजा 'हरिश्चन्द्र' की। जिसमें उसका राज-पाट छल से छीन लिया जाता है।
जो साबित करता है कि, सतयुग में छलकपट का बोलबाला था।
इतने न्यायकारी राजा का राज्य हरण हो जाने पर भी किसी विद्रोह का न होना यह भी साबित करता है कि, राजतन्त्र के शोषण से ग्रस्त जनता 'कोऊ होय नृप हमें तो हानी' की भावना से सत्ता के प्रति विरक्त थी।
राजसिंहासन, सेना व कोष के अपहरण के बाद भी दक्षिणा का साठ भार सोना वसूलने के लिए राजा को रानी व पुत्र के साथ काशी में ले जाकर नीलाम कर दिया जाता है।
राजपरिवार की नीलामी इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि, तब दासप्रथा अपने चरम पर थी।
जिसमें इंसान, इंसान को पशुओं की तरह ख़रीदता बेचता था। इस खरीद फरोख्त के लिए बाकायदा मण्डियां लगती थीं।
भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी बताई गई धर्म नगरी 'काशी' एक बड़ी 'दासमण्डी' थी।
रानी की नीलामी के समय वेश्या द्वारा बढ़-चढ़ कर बोली का लगाया जाना यह प्रमाणित करता है कि, काशी जैसी धर्मनगरी में भी, वेश्यावृत्ति खूब फल-फूल रही थी। खैर!
रानी व राजकुमार की नीलामी एक ब्राह्मण के नाम छूटती है।
रानी की नीलामी में ब्राह्मण और वेश्या के बीच बोली लगाने की प्रतिस्पर्धा बताती है कि, उस काल में भी ब्राह्मण व वेश्याओं के पास धन की प्रचुरता थी।
राजा को कालू नाम का भंगी खरीद लेता है। जो श्मशान घाट की राजकीय ठेकेदारी से 'मालामाल' था।
एक दिन राजा और रानी गंगा तट पर मिलते हैं। वह गंगा इस गंगा की कोई दादी-पड़दादी रही होगी? 😂
क्योंकि इस गंगा को तो शास्त्रानुसार हरिश्चंद्र की कई पीढियों बाद उन्हीं के वंशज भगीरथ लाए थे।
खैर छोड़ो! हमारा विषय गंगा का सच जानना नहीं, सतयुग का सच जानना है।
जल से भरा हुआ घड़ा उठाने में असमर्थ, कृशकाय राजा, रानी से मदद की गुहार करता है।
किन्तु अपना धर्म बिगड़ने के भय से रानी, भंगी के घर चाकरी करने वाले अपने पति का घड़ा छूने से साफ इनकार कर देती है।
सोचिए!
वर्णव्यवस्था जनित अस्पृश्यता का कैसा आतंक रहा होगा कि, डोम का नौकर होने मात्र से एक नारी अपने पति द्वारा छुए हुए घड़े को भी छूने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।
चलिए आगे बढ़ते हैं! रानी पुत्र का शव दफनाने के लिए श्मशान घाट पहुँचती है।
वहाँ कर वसूली के लिए तैनात स्वयं हरिश्चन्द्र पत्नी 'तारा' से 'कर' अदायगी के लिए कहता है। रानी अपनी लाचारी बताते हुए गिड़गिड़ाती है कि, मेरे पास तो तन पर लिपटी आधी साड़ी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। पुत्र के शव का कफ़न भी मैने तो आधी साड़ी फाड़कर बनाया है।
राजाज्ञा से विवश हरिश्चन्द्र अपने पुत्र को दफनाने के लिए भी, बिना कर लिए मरघट में जगह नहीं दे पाता।
कर के रूप में रानी की शेष आधी साड़ी को भी उतरवा कर उसे निःवस्त्र कर दिया जाता है। उफ वीभत्स! 😭
कितनी कठोर, कितनी अमानवीय कर व्यवस्था? पुत्रशोक से पीड़ित एक अकिंचन एकवस्त्रा नारी को, उसकी अस्मिता की परवाह किए बिना नग्न कर दिया जाता है?
यह है कथित सतयुग की धार्मिक नगरी काशी के धार्मिक राजा की धर्म व्यवस्था का सच।
बात यही नहीं रुकती। नि:वस्त्र रानी अपने केश छुटक कर छुप कर बैठ जाती है तो उसे 'डायन' घोषित कर दिया जाता है।
स्वयं हरिश्चन्द्र को उस डायन को मारने का हुक्म मिलता है और वो उसे मारने के लिए बांस उठा लेता है।
कैसा सत्यवादी है?
जो यह सत्य नहीं बता पाया कि, यह डायन नहीं, मुसीबतजदा मेरी पत्नी है। जिसकी साड़ी कर वसूली में मैने स्वयं उतरवाई है।
यह है कथित सतयुग का सच। जिसमें 'छलकपट' 'दासप्रथा' 'वेश्यावृत्ति' 'अश्पृश्यता' असंवेदनशील राजतन्त्र की कठोर 'करव्यवस्था' 'अशिक्षा' 'अंधविश्वास' आदि अपने चरम पर दिखाई देते हैं। संवेदनशीलता के साथ जरा सोचो!
क्या चाहिए ऐसा सतयुग?
आखिर क्या कारण है कि, ईसा पूर्व 1500 वर्ष से ईसा पूर्व
500 वर्ष तक के एक हजार वर्ष के 'वैदिक काल' में चार युग बदल गए तथा चौबीस अवतार हो गए?
किन्तु यूनानियों से सीखे, 'डे वाई डे एन्ड डेट वाई डेट' के आधार पर इतिहास लेखन के बाद बौद्धकाल से अब तक ढाई हजार वर्षों से न कोई युग बदला और न कोई अवतार हुआ?
और आगे भी न युग बदलने की, न अवतार होने की दूर-2 तक कोई संभावना दिखाई नहीं देती।
अनीति, अज्ञान, अन्याय, अमानवीयता, अंधविश्वास, असत्य व अशिक्षा से भरी राजा रानियों की जिन शोषणकारी कहानियों को हम बन्द दिमाग के साथ धर्म मानकर ढो रहे हैं, वही हमारे दुख-दर्द का कारण बनी हुई हैं।
आज जरूरत है समाज को 'सजग' होकर सोचने की। सतयुग की स्थापना शैक्षिक सजगता, समानता, स्वतंत्रता व सम्पन्नता की बुनियाद पर ही सम्भव है। जिसके लिए सतत संघर्ष जारी है।
अतः आइए!
सतयुग की कल्पना को साकार करने के लिए एक ऐसे शोषण रहित आदर्श समाज के निर्माण की शुरुआत करें,
जिसमें जन्म या कर्म के आधार पर न कोई ऊँचा हो और न कोई नीचा, सभी शिक्षित हों, सजग हों, सम्पन्न हों। जिसमें न कोई धूर्त हो और न कोई मूर्ख।
एक ऐसा समाज, 'सत्य' ही जिसका ईश्वर हो! 'कर्तव्य' ही जिसका धर्म हो! और 'कर्म' ही जिसकी पूजा हो!
14/05/2026
Good evening friends 😘
14/05/2026
At gyanpur road near railway station
14/05/2026
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Youtube wale baba SandhyaSaroj Sandhya Saroj
13/05/2026
Visit at gyanpur road
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