Niraj Mishra
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फिजिकल हेल्थ- प्रीमेच्योर डेथ का बड़ा कारण अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड:बर्गर, पिज्जा, फ्राइज से रहें दूर, नेचुरल फूड ही है सही खान
आजकल अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स हमारे रोजमर्रा के खानपान का बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं। आसानी से उपलब्ध, आकर्षक पैकेजिंग और लाजवाब स्वाद के चलते ये फूड्स बच्चों से लेकर बड़ों तक की पसंद बन चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये फूड्स हमारी सेहत के लिए एक स्लो पॉइजन हैं, जो धीरे-धीरे शरीर को भीतर से खोखला करते हैं।
हाल ही में अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन (AJPM) में पब्लिश एक स्टडी में बताया गया है कि जो लोग ज्यादा मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, उनके समय से पहले मौत (प्रीमेच्योर डेथ) का खतरा काफी बढ़ जाता है।
स्टडी के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति अपनी डाइट में सिर्फ 10% अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बढ़ा देता है तो 75 साल से पहले उसकी मृत्यु का रिस्क लगभग 3% तक बढ़ जाता है। कुछ देशों में तो हालात इतने गंभीर हैं कि हर 7 में से एक प्रीमेच्योर डेथ के पीछे यही कारण होता है। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में हर साल लाखों लोगों की मौतें सीधे तौर पर इन फूड्स से जुड़ी बीमारियों की वजह से हो रही हैं।
हालांकि थोड़ी सी जागरूकता और खानपान की समझ से इस खतरनाक लत से बचा जा सकता है।
तो चलिए, आज फिजिकल हेल्थ कॉलम में हम अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के बारे में विस्तार से बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में क्या अंतर है?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सेहत के लिए कितने नुकसानदायक हैं?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड क्या है?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड वे खाद्य पदार्थ होते हैं, जो इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग से तैयार किए जाते हैं। इनमें प्रिजर्वेटिव, इमल्सीफायर, आर्टिफिशियल फ्लेवर, कलर, एडेड शुगर, सेचुरेटेड फैट और नमक जैसी कई चीजें मिलाई जाती हैं। इनका उद्देश्य फूड को लंबे समय तक खराब होने से बचाना और उसे स्वाद व दिखने में अधिक आकर्षक बनाना होता है। आसान भाषा में कहें तो ये रेडी-टू-ईट फूड्स होते हैं, जिन्हें बार-बार गर्म करने या पकाने की जरूरत नहीं होती है।
इनमें फ्रोजन फूड्स, शुगरी ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड मीट, इंस्टेंट नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, मोमोज, फ्रेंच फ्राईज, चिप्स, नमकीन, कुकीज, केक और मफिन जैसे प्रोडक्ट्स शामिल होते हैं, जो दिखने और खाने में तो लाजवाब होते हैं, लेकिन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं।
प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में अंतर
प्रोसेस्ड फूड्स में खाद्य पदार्थ की मूल संरचना और न्यूट्रिशन काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं। इनमें आमतौर पर सफाई, कटाई, उबालना, फ्रीज करना या सीमित मात्रा में एडिटिव्स का इस्तेमाल होता है।
वहीं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में मेकैनिकल प्रोसेसिंग की जाती है और इनमें आर्टिफिशियल इंग्रेडिएंट्स मिलाए जाते हैं, जिससे इनके न्यूट्रिएंट्स काफी हद तक प्रभावित हो जाते हैं। नीचे दिए ग्राफिक में दोनों के बीच अंतर को समझिए-
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में कैलोरी की मात्रा होती है ज्यादा
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में नेचुरल कंटेंट की मात्रा बहुत कम और आर्टिफिशियल इंग्रेडिएंट्स की मिलावट ज्यादा होती है। यही कारण है कि इन फूड्स में कैलोरी की मात्रा काफी ज्यादा हो जाती है, जो सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA) के मुताबिक, एक स्वस्थ व्यक्ति को रोजाना लगभग 2,000 से 3,000 कैलोरी की जरूरत होती है। यह मात्रा व्यक्ति की उम्र, लिंग, फिजिकल एक्टिविटी और अन्य कारकों पर निर्भर करती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि सिर्फ एक पीस प्रोसेस्ड फूड ही व्यक्ति की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर सकता है। नीचे दिए गए ग्राफिक में कुछ पसंदीदा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स और उनमें मौजूद कैलोरी की मात्रा दी गई है। इसे समझिए-
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सेहत के लिए खतरनाक
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स ज्यादा खाने से मोटापा, हार्ट डिजीज, फैटी लिवर और डायबिटीज जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन (BHF) की रिपोर्ट के मुताबिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के ज्यादा सेवन से हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
वहीं अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी की भी एक रिपोर्ट बताती है कि हर दिन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से कार्डियोवस्कुलर डिजीज का रिस्क 5% बढ़ जाता है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए-
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स से बचने के तरीके
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का सेवन बढ़ता जा रहा है। लेकिन थोड़ी सी समझदारी और प्लानिंग से हम इनसे बच सकते हैं और अपनी सेहत को बेहतर बना सकते हैं। इसके लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी आदतें अपनाएं। जैसेकि-
अपनी डाइट में ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें और घर में पका ताजा खाना शामिल करें।
रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड्स की बजाय घर की बनी सादी, संतुलित और पोषणयुक्त चीजें खाएं।
रेडी-टू-ईट, इंस्टेंट नूडल्स, माइक्रोवेव मील्स और प्रोसेस्ड मीट जैसे शॉर्टकट विकल्पों से दूर रहें।
कोई भी पैकेज्ड या प्रोसेस्ड फूड खरीदने से पहले उसका लेबल जरूर पढ़ें। अगर इंग्रेडिएंट्स की लिस्ट में ज्यादा मात्रा में शुगर, नमक, ट्रांस फैट, आर्टिफिशियल कलर और फ्लेवर हो तो उसे न खरीदें।
लंबे समय तक भूखे रहने से व्यक्ति जल्दी से भूख मिटाने के लिए प्रोसेस्ड फूड्स की ओर आकर्षित होता है। इसलिए नियमित एक समय पर भोजन करें।
जब भूख लगे तो बिस्किट या चिप्स की जगह मखाने, फल, ड्राई फ्रूट्स या मूंगफली जैसे हेल्दी स्नैक्स साथ रखें।
कोल्ड ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस, कुकीज, केक, नमकीन जैसे आइटम्स में हिडन शुगर और ट्रांस फैट्स की मात्रा काफी होती है। इनसे पूरी तरह दूरी बनाएं।
धीरे-धीरे शुरुआत करें। हफ्ते में एक दिन बाहर का खाना छोड़ें, फिर दो दिन करें। धीरे-धीरे बदलाव अपनाएं।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स से जुड़े कॉमन सवाल-जवाब
सवाल- क्या थोड़ा-बहुत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाना भी नुकसानदायक है?
जवाब- कभी-कभार थोड़ी मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से शायद तुरंत कोई बड़ा नुकसान न हो। लेकिन नियमित और ज्यादा मात्रा में इनका सेवन सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कोशिश करें कि अपनी डाइट में इनकी मात्रा कम-से-कम रखें।
सवाल- क्या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स बच्चों के लिए ज्यादा नुकसानदायक होते हैं?
जवाब- हां, बच्चों का मेटाबॉलिज्म तेजी से बढ़ता है और उन्हें संतुलित डाइट की जरूरत होती है। चिप्स, केक, कैंडीज, इंस्टेंट नूडल्स, शुगरी ड्रिंक्स जैसे फूड्स उनके फिजिकल और मेंटल डेवलपमेंट को प्रभावित कर सकते हैं।
सवाल- अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स मोटापा क्यों बढ़ाते हैं?
जवाब- डॉ. मृगांका बोहरा बताती हैं कि इनमें हाई कैलोरी, ज्यादा शुगर और ट्रांस फैट होते हैं, जो वजन तेजी से बढ़ा सकते हैं। साथ ही मेटाबॉलिक डिसऑर्डर का कारण बन सकते हैं।
गुड हैबिट्स- मोबाइल के बिना रहने की आदत:कुछ घंटे स्क्रीन से रहें दूर, डालें डिजिटल डिटॉक्स की आदत, ये 3 टिप्स काम आएंगे
आज का युग डिजिटल युग है। हमारे चारों तरफ स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट और इंटरनेट की दुनिया है। ये गैजेट्स हमारी जिंदगी को आसान बनाते हैं, लेकिन इनका ज्यादा उपयोग हमारे दिमाग और शरीर पर भारी पड़ सकता है। सुबह उठते ही फोन चेक करना, रात को सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना और दिनभर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहना। यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। क्या आपने कभी सोचा कि इस डिजिटल दुनिया से थोड़ा ब्रेक लेना कितना जरूरी हो सकता है? यहीं से आता है डिजिटल डिटॉक्स का कॉन्सेप्ट, जो हमें तकनीक से दूरी बनाकर अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।
आज ‘गुड हैबिट्स’ कॉलम में डिजिटल डिटॉक्स की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि डजिटल डिटॉक्स क्यों जरूरी है?
इसके क्या फायदे हैं और कैसे इसे जीवन में अपनाएं?
डिजिटल डिटॉक्स क्या है?
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है कुछ समय के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टैबलेट और ऐसे सभी डिजिटल गैजेट्स से दूरी बनाना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें हम जानबूझकर स्क्रीन टाइम को कम करते हैं और वास्तविक दुनिया की गतिविधियों में समय बिताते हैं। डिजिटल डिटॉक्स का उद्देश्य हमारे दिमाग को डिजिटल उत्तेजना से आराम देना और जीवन में संतुलन लाना है। उदाहरण के लिए, यह एक दिन बिना फोन के बिताना हो सकता है या कुछ घंटे बिना इंटरनेट के रहना। यह हमें अपने आसपास की दुनिया, परिवार और दोस्तों के साथ फिर से जुड़ने का मौका देता है।
*डिजिटल डिटॉक्स की जरूरत क्यों है?
आज के समय में डिजिटल उपकरणों का उपयोग इतना बढ़ गया है कि लोग औसतन 10 घंटे से ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं। डेलॉइट के 2015 के एक सर्वे के मुताबिक, 59% स्मार्टफोन यूजर्स सोने से 5 मिनट पहले और जागने के 30 मिनट के भीतर सोशल मीडिया चेक करते हैं। यह हद से ज्यादा उपयोग हमारे दिमाग पर बोझ डालता है। खासकर कोविड-19 के दौरान, जब लोग घरों में बंद थे, डिजिटल उपकरणों का उपयोग और भी बढ़ गया।
फिजिकल हेल्थ- क्या चावल खाने से डायबिटीज होता है?:क्या चावल से बेहतर है रोटी, जानें मिथ और सच्चाई, इसके 8 हेल्थ बेनिफिट्स
3 घंटे पहले
क्या चावल खाने से डायबिटीज होता है? इसका जवाब नहीं है। क्या चावल खाने से फैट बढ़ता है? इसका जवाब है कि यह अकेला कारण नहीं है। बीते कुछ सालों में चावल को लेकर जिस तरह से परसेप्शन बना है कि यह अच्छा भोजन नहीं है। यह बिल्कुल गलत परसेप्शन है, जिसके कारण लोग अपनी थाली से चावल अवॉइड करने लगे हैं।
इंसान कम-से-कम पिछले 5,000 सालों से चावल उगा रहे हैं। यह दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी के लिए मुख्य भोजन है। दुनिया का ज्यादातर चावल एशियाई देशों में उगाया जा रहा है।
चावल ग्लूटेन-फ्री होता है। इसलिए यह उन लोगों के लिए भी सेफ है, जिन्हें गेहूं या ग्लूटेन से एलर्जी होती है। पानी की कमी और थकान से बचने के लिए चावल जैसे न्यूट्रिशनल, आसानी से पचने वाले और हाई एनर्जी फूड को डाइट में शामिल करना एक स्मार्ट और साइंटिफिक चॉइस हो सकती है।
आज ‘फिजिकल हेल्थ’ में चावल के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
चावल की न्यूट्रिशनल वैल्यू क्या है?
चावल खाने के फायदे क्या हैं?
इसे किन बीमारियों में नहीं खाना चाहिए?
चावल में कॉम्प्लेक्स कार्ब होता है
चावल में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट होता हैं, जो शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा देता है। सफेद चावल का पाचन आसान होता है। इसलिए बुखार, डिहाइड्रेशन या पाचन से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद होता है। वहीं ब्राउन राइस में फाइबर, विटामिन B और एंटीऑक्सीडेंट्स ज्यादा होता है, जो पाचन में, मेटाबॉलिज्म और हार्ट हेल्थ के लिए मददगार हैं।
17/11/2024
साली के साथ
17/11/2024
लंबे समय बाद ससुराल मे।
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